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बुधवार, 16 अगस्त 2017

बातें हैं बातों का क्या .......

अम्बुआ की डाली पर
चाहे न कुहुके कोयल
किसी अलसाई शाम से
चाहे न हो गुफ्तगू
कोई बेनामी ख़त चाहे
किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए
ज़िन्दगी का कोई नया
शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये
अंततः
बातें हैं बातों का क्या ...

अब के देवता नहीं बाँचा करते
यादों की गठरी से ... मृत्युपत्र

न दिन बचना है न रातें
फिर बातों का भला क्या औचित्य ?

श्वेत केशराशि भी कहीं लुभावनी हुआ करती हैं
फिर
क्यों बोझिल करें अनुवाद की प्रक्रिया

जाओ रहो मस्त मगन
मेरे बाद न मैं , मेरे साथ भी न मैं
बस सम ही है अंतिम विकल्प समस्त निर्द्वंदता का

कौन हल की कील से खोदे पहाड़ ?




डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

रविवार, 13 अगस्त 2017

देश में सब ठीक ठाक है

चलिए शोक मनाईये ... दो मिनट का मौन रखिये ... एक समिति गठित कीजिये और विभागीय कार्यवाही करिए ...... बस इतना करना काफी है उनके घावों पर मरहम लगाने को और पूरा घाव ठीक करने को २०-२५ लाख दे कर कर दीजिये इतिश्री अपने कर्तव्य की .....आखिर सरकार माई बाप हैं आप और माई बाप को सिर्फ एक को ही थोड़े देखना है .....पूरा देश उनके बच्चों सरीखा है और हर बच्चे का ध्यान रखना जरूरी है ऐसे में यदि दो चार उपेक्षित भी हो जाएँ तो फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि अगस्त में बच्चे तो मरते ही रहते हैं ........माई बाप हम अनपढ़ गंवार कहाँ जान सकते हैं और समझ सकते हैं आपकी देशभक्ति. आपकी सुरक्षा चाक चौबंद होनी जरूरी है बच्चों का क्या है ये तो पैदा होते ही मरने के लिए हैं जैसे आम जनता. क्या देशहित में इतना बलिदान नहीं कर सकती जनता. आप तिरंगा फहराइए 15 अगस्त पर जनाब .....लाल किले से भाषण जरूरी है आखिर स्वतन्त्रता का उत्सव जो ठहरा तो क्या हुआ जो कुछ घरों के चिराग बुझ गए और वो मातम मनाते रहें उस दिन , हर दिन , सालों साल, उम्र भर ...... अनुशासन तो अनुशासन ठहरा. कर्तव्य है आपका देश को संबोधित करना, उन्हें बताना सब ठीक है, आपने सब ठीक कर दिया है, देश विकास कर रहा है तो क्या हुआ जो कोई माँ बौरा ही गयी हो रोते रोते. किसी पिता की चीख नहीं पहुंचेगी आपके कान तक. विकास की दिशा में जनता की आहुति होती रहनी चाहिए आखिर आपने भ्रष्टाचार ख़त्म कर दिया, विदेशी धन वापस ले आये, इनकम टैक्स चोरी ख़त्म कर दी, गायों की रक्षा की, किसान सुखी हो चुका, उसने आत्महत्या करनी बंद कर दी, लड़कियां देखिये कितने सुरक्षित हैं आधी रात भी निकलें तो मजाल है कोई निगाह भी उठा ले उनके बलात्कार होने बंद हो चुके ये तो विपक्ष या मीडिया हल्ला मचाता है वर्ना आपने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, यहाँ तक कि पाठ्यक्रम में बदलाव कहाँ किसी ने किया वहाँ प्रेमचंद, टैगोर , ग़ालिब आदि को हटाने की जुर्रत भला किसी में थी आपने वो भी करने की ठान ली ...भला और कोई कहाँ कर पाया इतना पिछले 70 सालों में जो आपने 3 साल में कर दिखाया ......नतमस्तक है हुजूर जनता आपके चरणों में ......बंदगी करने को जरूरी है खुद को देशभक्त दिखाना क्योंकि यही है आज की सच्ची परिभाषा ....गर करोगे विद्रोह या नहीं कहेंगे आपके पक्ष में तो देशद्रोही करार दिए जाते हैं ........तो हुजूर , आप हैं तो हम हैं वर्ना हममें भला कहाँ दम है ......न हुजूर ये आप पर न व्यंग्य है न तोहमत ..... आपका इस्तकबाल करती है जनता. आपने इतना कुछ दिया जनता को कि आँखें डबडबा जाती हैं, मुंह से बोल नहीं फूट रहे, कलेजा फटा जा रहा है आपकी दरियादिली से ... बहुत बहुत शुक्रिया सरकार आपका , वाकई रामराज्य आ गया और अगले दो सालों में तो शायद जनता वैकुण्ठ दर्शन कर ले .... जय हिन्द , १५ अगस्त की आपको शुभकामनाएं जनता की तरफ से .......देश में सब ठीक ठाक है आप अपना भाषण और भ्रमण जारी रखिये

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

ये मेरी हत्या का समय है

ये मेरी हत्या का समय है
न कोई पूर्वाभास नहीं
कोई दुर्भाव नहीं
बस जानता हूँ
तलवारों की दुधारी धार को

मैं विवश हूँ
स्वीकारने को नियति
धिक्कारने को प्रगति
जिसकी बिनाह पर हो रहे हैं कत्ले आम

धरोहरें सहमी खड़ी हैं
अपनी बारी की प्रतीक्षा में
बाढ़ में बहते धान की चीखें कब किसी कान तक पहुंची हैं

दुर्भावना मेरा स्वभाव है
और सम्भावना उनका
तो सोच लो
क्या होगा हश्र
या कहूँ
यही है सच
ये मेरी हत्या का समय है


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©वन्दना गुप्ता vandana gupta)