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शुक्रवार, 2 जून 2017

दिल हूम हूम करे ......

तुम मेरे सपनो के
आखिरी विकल्प थे शायद
जिसे टूटना ही था
हर हाल में

क्योंकि
मुस्कुराहट के क़र्ज़ मुल्तवी नहीं किये जाते
क्योंकि
उधार की सुबहों से रब ख़रीदे नहीं जाते

एक बार फिर
उसी मोड़ पर हूँ
दिशाहीन ...

चलो गुरबानी पढो
कि
यही है वक्त का तक़ाज़ा
कहा उसने

और मैंने
सारे पन्ने कोरे कर लिए
और तोड़ दी कलम
कि
फिर से न कोई मुर्शिद
लिख दे कोई नयी आयत

दिल हूम हूम करे ......'


डिसक्लेमर
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-06-2017) को
"प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक