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बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोहब्बत का पीलापन

मेरी मोहब्बत के अश्क
जज़्ब ही हुए
बहने को जरूरी था
तेरी यादों का कारवाँ

लम्हे ख़ामोशी से समझौता किये बैठे हैं
इंतज़ार की कोई धुन होती तो बजाती

इतनी खाली इतनी उदास मोहब्बत
ये मोहब्बत का पीलापन नहीं तो क्या है ?

और ये है मोहब्बत का इनाम
कि
अब तो आह भी नहीं निकलती

मेरी मोहब्बत के रुसवा होने का अंदाज़ ज़माने से कुछ जुदा ही रहा 
फिर उस इश्क का इकतारा कैसे बजाऊँ
जिसके सब तार टूट चुके हों 
आमीन कहने को जरूरी है कोई इक दुआ .........


डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

'अति सर्वत्र वर्जयेत'

मैं कविता का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष
मैं कवयित्री का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष
और खिंच गयी तलवारें दोनों ही ओर से

गहन वेदना में थी उस वक्त
जिंदा थी या मर चुकी थी कविता
आकलन को नहीं था कोई संवेदनशील बैरोमीटर

कि
जरूरी था शोर
जरूरी था बस
अपराधी को अपराधी सिद्ध किया जाना 

या निरपराधी को अपराधी सिद्ध किया जाना
दोनों ही ओर से
निपट स्याह स्याही से लिखी जा रही थी इबारत
नाज़ करने को फिर चाहे
बचे ही न सियासत 


रियाया मजबूर है
फटे कपड़ों से तन ढांकने को
राजज्ञा की अवमानना
आज के वक्त का सबसे बड़ा गुनाह जो है
उस पर सिपहसालार और मंत्रिपरिषद जानते हैं
कैसे चुने जाते हैं अर्थी से फूल
फिर क्यूँ पचड़े में पड़ते हो 

ये मूढ़मगज समय है 
जिसमे उधर ही झुक जाते हैं पलड़े 
जिधर भार ज्यादा होता है 
मगर इस बार संतुलन का काँटा 
ख्याति का मध्य भाग बना 
फैला रहा है अराजकता 

पुरस्कारों की क्रांति से 
बिफरा तबका 
अपने अपने कसबे का बनकर 
बेताज बादशाह 
कर रहा है हलाल 
कविता की घिंघियाती आवाज़ से नहीं होता स्वप्नदोष 
बस जरूरी है स्खलन 



तो क्या हुआ
जो हो कविता के नाम पर
तो कभी साहित्य के नाम पर
भाषा का बलात्कार
रोना तो कविता को ही है
क्योंकि
कविता का जिस्म तार तार है
और शामिल है पूरा गिरोह जहाँ
वहां
हवन पूजा यज्ञ आदि से नहीं हुआ करती शांति

कि
ये कविता का उत्तर पक्ष नहीं
सूर्यदेव दक्षिणायन को गए हुए हैं 
'अति सर्वत्र वर्जयेत' महज चेतावनी का हास्यास्पद रूप है आज ...

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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

साहेब ने कहा

साहेब ने कहा
लडकियाँ आधी रात को भी अकेली बेधड़क कहीं भी जा सकेंगी . एक बार देश की डोर मेरे हाथ देकर तो देखो .मेरे गुजरात में रात को दो बजे भी लड़की स्कूटी पर अकेली कहीं भी जा सकती है .
कर लिया विश्वास , दे दी डोर . मगर क्या मिला ?
एक बार फिर जनता धोखा खा गयी . अब दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश या कोई भी अन्य प्रदेश स्त्रियाँ , लडकियाँ कल भी गैंग रेप की शिकार हो रही थीं और आज भी बल्कि दुगुनी तादाद से .
आप तो सारे देश के प्रधानमंत्री हैं . आपसे ही उम्मीद थी आप स्त्रियों के लिए कुछ करेंगे लेकिन क्या हो रहा है साहेब . जरा यहाँ भी दृष्टि घुमाइए . सिर्फ प्रदेश में मत बांटिये देश को , स्त्रियों को . आप चाहें तो क्या नहीं हो सकता . कुछ देर राजनीति से ऊपर उठ जाइए इंसानियत के नाते ही सही .
आखिर कब तक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के नाम पर स्त्रियों के सम्मान और भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता रहेगा ?
क्या आप समझ सकते हैं किस पीड़ा से गुजरती होगी एक स्त्री ऐसी परिस्थिति में . जनाब आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते उसकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा का .
आपसे अनुरोध है बाहर से बेहतर एक बार घर की तरफ भी दृष्टि कीजिये . यहाँ की सुध भी लीजिये . यकीन मानिए जिस दिन आप हर घर और बाहर में स्त्री को सुरक्षित कर देंगे आधी आबादी तो वैसे ही आपके पक्ष में खड़ी हो जायेगी . आपको फिर अलग अलग प्रदेश के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ेंगे .
एक बार हिम्मत कीजिये . अविलम्ब न्याय का प्रावधान कीजिये . आज देश की हर स्त्री की निगाह आप पर टिकी है साहेब . न्याय में इतनी देर मत कीजिये कि वो अन्याय की श्रेणी में आ जाए .
क्योंकि जनता जानती है यदि आप चाहें तो सब कुछ संभव है . इस बार सुन लीजिये जरा स्त्रियों के मन की बात भी , अपने मन की तो आपने बहुत कह ली और उन्होंने बहुत सुन ली .
कहते हैं वही राजा और उसका राज्य सुरक्षित रहता है जहाँ की प्रजा सुखी हो . क्या स्त्रियाँ आपकी प्रजा नहीं ? क्या उनका मान सम्मान आपका मान सम्मान नहीं .........जरा सोचिये !