पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

बेमुरव्वत!

आने वाला आता है जाने वाला जाता है
दस्तूर दुनिया का हर कोई निभाता है

कोई खार बन तल्ख़ ज़ख्म दे जाता है
कोई यादों में गुलाब बन खिल जाता है

बेमुरव्वत! इक फाँस सा सीने में धंसा जाता है
उम्र भर का लाइलाज दर्द जो दिए जाता है

गिले शिकवों का शमशानी शहर बना जाता है
जब भी यादों में बिन बुलाये चला आता है

यही जाते साल को नज़राना देने को जी चाहता है
फिर न किसी मोड़ पर तू ज़िन्दगी के नज़र आना

मुझे मुझसे चुरा लिया बेखुदी में डुबा दिया
अब किसी पर न ऐतबार करने को जी चाहता है


गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

बेखुदी के शहर में

इश्क का लबालब भरा प्याला था जब
उमंगों की पायल अक्सर छनछनाया करती थी
छल्का करता था गागर से इश्क का मौसम बेपरवाह सा

मगर अब बेखुदी के शहर में लगी आग में
झुलस गयी है मेरे इश्क की गुलाबी रंगत
मातमपुर्सी को नहीं है रूह के पास कोई साजो सामान

कौन सा सवाया लगाऊँ
किस पीर फ़क़ीर से मुनादी कराऊँ
कि राज-ए-उल्फ़त में कतरा - कतरा बिखरा है जूनून मेरा

ओ बेखबर शहर के खुमार
यूँ अक्सर खुद को घटते देख रही हूँ मैं ...........

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

कत्ले आम का दिन था वो

 
 
कत्ले आम का दिन था वो
अब सन्नाटे गूंजते हैं
और खामोशियों ने ख़ुदकुशी कर ली है

तब से ठहरी हुई है सृष्टि
मेरी चाहतों की
मेरी हसरतों की
मेरी उम्मीदों की

अब
रोज बजते शब्दों के झांझ मंजीरे
नहीं पहुँचते रूह तक

तो क्या खुदा बहरा हो गया या मैं
जिंदा सांसें हैं या मैं
मौत किसकी हुई थी उस दिन
नहीं पता
मगर रिश्ता जरूर दरक गया था

और सुना है
दरके हुए आईने को घर में रखना अपशकुन होता है

रविवार, 29 नवंबर 2015

लव ब्लॉसम्स हेयर जानां ...........

 
 
प्यार महकता है
मोहब्बत की सौंधी सौंधी महक
इश्क की खुशबू
कुछ भी कहूँ
बात तो एक ही है
बस जरूरत है तो इतनी सी
वो तुम तक पहुँचे

वो ' तुम '
कोई भी हो सकते हो
न मैंने नहीं देखा तुम्हें
नहीं जानती कौन हो
कहाँ हो , कैसे हो
बस महकते हो मुझमे साँसों से
चहकते हो , बहकते हो
और मैं बेबस सी
तुम्हारी अनजानी अनदेखी मोहब्बत में गिरफ्तार
युगों से प्रतीक्षा की दहलीज पर
सजदा किये बैठी हूँ
एक कभी न बुझने वाली चिर परिचित प्यास का घूँट पीकर

जबकि जानती हूँ
तुम नहीं हो कहीं
न यहाँ न कहीं और इस पूरे ब्रह्माण्ड में
सिवाय मेरे अनचीन्हे ख्याल की पुआल पर बैठे एक जोगी की तरह

सदायें बिना पंखों की वो पंछी हैं
जिन्हें उड़ने को न आकाश चाहिए
और न ही धड़कने को दिल
पहुँच ही जाती हैं मंजिल तक

जाने क्यों फिर भी कहने को दिल करता है
मृग की नाभि में कस्तूरी सा
लव ब्लॉसम्स हेयर जानां ...........

रविवार, 22 नवंबर 2015

बस चलन है

जाने कैसी दुनिया कैसे लोग
नकाब पर नकाब पर नकाब डाल 
जी लेते हैं जो
और वो छद्मों को
उँगलियों पर गिनते गिनते बुढा जाते हैं
फिर भी न फितरत समझ पाते हैं
और एक दिन उकता कर
ख़ुदकुशी को निकल जाते हैं
फिर वो ख़ुदकुशी
समाजिक हो राजनीतिक हो या साहित्यिक 

ये लेखक की साहित्यिक मौत नहीं
राजनीतिज्ञ की राजनीतिक मौत नहीं
इंसान की समाजिक मौत नहीं
ये वैसे भी कभी बहस का मुद्दा होता ही नहीं
अति भावुकता का होना और व्यावहारिक होने में कुछ तो फर्क होता ही है

बस चलन है अपने अपने देश का
समझ सकते हो तो रहना जंगल में वर्ना ...

देश निकाले के सबके लिए अपने अपने अर्थ होते हैं


शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

क्या सच में जिए ?

जीने की चाहत में मरना जरूरी था
फिर भी ज़िन्दगी से मिलन अधूरा था

सच ही तो है
जी लिए इक ज़िन्दगी
फिर भी
इक खलिश जब उधेड़ती है मन के धागे
चिंदी चिंदी बिखर जाती है पछुआ के झोंके से

मजबूरी में जीने और इच्छानुसार जीने में कुछ तो फर्क होता है
हाँ , समझौतों के लक्ष्मण झूलों पर झूलते
जब ज़िन्दगी गुजरती है
तब प्रश्न उठना लाजिमी है

वैसे क्या ये सच नहीं है
कि
यहाँ मनचाहा जीवन कभी कोई जीया ही नहीं

सभी अपनी आधी अधूरी चाहतों की
अतृप्त प्यास से जकड़े ही कूच कर गए 
 
खाली बर्तनों की टंकारें खोखली ही हुआ करती हैं  

ऐसे में
क्या सच में जिए ?
प्रश्न मचा देता है हलचल
और हम हो जाते हैं निशब्द ...
 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मौन के दुर्दिन

समय के कांटे हलक में उगकर अक्सर करते रहे लहुलुहान और तकलीफ की दहलीज पर सजदा करना बन गया दिनचर्या . ऐसे में कैसे संभव था शब्दों से जुगलबंदी करना . मौन के पंछियों का डेरा नियमित आवास बन गया फिर भी कुछ था जो कुरेद रहा था तरतीब से बिछे गलीचों को . गलीचों की ऊपरी सुन्दरता ही मापदंड है - ' सब कुछ ठीक है ' का . फिर कैसे संभव था अनकहे को लिपिबद्ध करना या खंगालना .

न , न यहाँ कोई नहीं जो भाषा की जुगाली करे या भावों का तर्पण . एक चुप्पी का कटघरा ही अक्सर संवाद करना चाहता है मगर मेरे पास कोई नहीं जो मेरे मौन से मुझे अवगत कराये .

चुप्पियों को घोंटकर पीने का वक्त है ये . मौन के दुर्दिन हैं ये जहाँ संवाद की हत्या हो गयी है ऐसे में जीत और हार बराबरी से विवश हैं सिर्फ शोक मनाने को ....

रविवार, 8 नवंबर 2015

वैश्या , कुल्टा और छिनाल

शौक़ीन हूँ मैं
तुम्हारे दिए संबोधनों
वैश्या , कुल्टा और छिनाल की

तुम्हारे उद्बोधनों का
जलता कोयला रखकर जीभ पर
बजाते हुए ताली
मुस्कुराती हूँ जब खिलखिलाकर
खुल जाते हैं सारे पत्ते
तुम्हारी तहजीब के
और हो जाते हो तुम
निर्वस्त्र ...

बात न जीत की है न हार की
यहाँ कोई बाजी नहीं लगी
न ही शर्त है बदी
बस
तुम्हारा तमतमाता ध्वस्त चेहरा
गवाह है
तोड़ दी हैं स्त्री ने
तुम्हारी बनायी कुंठित मीनारें


तुम्हारी छटपटाहट
बिलौटे सी जब हुंकारती है
स्त्री हो जाती है आज़ाद
और उठाकर रख देती है एक पाँव
आसमा के सीने पर
छोड़ने को छाप इस बार
बनकर बामन नापने को तीनों लोक
कि
फिर न हो सके
किसी भी युग में
किसी भी काल में
स्त्री फिर से बेबस , मूक , निरीह ...

अंत में
सोचती हूँ बता ही दूं
तुम्हें एक सत्य
कि
तुम्हारे दिए उद्बोधन ही बने हैं नींव
मेरी स्वतंत्रता के ......

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

विडंबना

जिन राहों की कोई मंजिल नहीं होती
वहां पदचिन्ह खोजने से क्या फायदा
ये जानते हुए भी
आस की बुलबुल अक्सर
उन्ही डालों पर फुदकती है
ख्यालों की बंदगी करने लगती है

शायद ऐसा हो जाए
न न ऐसा ही होगा
ऐसा ही होना चाहिए
आस का कोई भी पहलू
एक बार बस करवट बदल ले
उम्मीद के चिराग देह बदलने लगते हैं

जबकि
जानते सभी हैं ये सत्य
सिर्फ ख्यालों और चाहतों की जुगलबंदियों से नहीं बना करते नए राग

अब ये मानव मन की विडंबना नहीं तो और क्या है ?

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

खिन्न मौन

शब्द विचार और भावों का एक खिन्न मौन
जाने किस रति का मोहताज

संवेदनहीनता की निशानी
या 
निर्लेप निरपेक्षता को प्रतिपादित करता

प्रश्न सिर उठाये बैरंग लौट आया

तो क्या ये
मौन से मौन तक की ही कोई गति है ?

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

बस , कलम तू उनकी जय जय बोल

जिनके नहीं कोई दीन ईमान 
कलम तू उनकी जय जय बोल

जो तू उल्टी चाल चलेगी
तेरी न यहाँ दाल गलेगी
प्रतिरोध की बयार में प्यारी
तेरी ही गर्दन पे तलवार चलेगी
बस , कलम तू उनकी जय जय बोल

जो तू सम्मान वापस करेगी
तब भी तेरी ही अस्मत लुटेगी
प्रतिरोध की ये फांस भी
न उनके गले से नीचे उतरेगी
कलम तू उनकी जय जय बोल

इस पासे न उस पासे
तुझे चैन लेने देगी
ये धार्मिक अंधी कट्टरता
राजनीति का पहन कर चश्मा
तेरा ही विरोध करेगी
कलम तू उनकी जय जय बोल

तेरे स्वाभिमान की तो यहाँ
ऐसे ही धज्जियाँ उडेंगी
गर कर सके समझौता उनसे
तभी तू जीवित रह सकेगी
बस , कलम तू उनकी जय जय बोल 


( रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति साभार : कलम , आज उनकी जय बोल )

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

जश्न अभी बाकी है

न मेरा दर हवाएं खटखटाती
न मैं हवाओं के घर जाती
अपनी अपनी मसरूफियतें हैं
अपने अपने शिकवे शिकायतें
फिर भी अक्सर
राह चलते होती मुलाकातों में
एक अदद मुस्कराहट का पुल
संभावनाओं का साक्षी है
कि है उधर भी ऊष्मा बची हुई
कि है उधर भी अहसासों संवेदनाओं की धरती बची हुई

अब फर्क नहीं पड़ता
कि गले लगाकर ही ईद सा उत्सव मनाएं और खुद को बहलायें
हकीकत की मिटटी अभी नम है

तो फिर मुस्कुराओ न ... जश्न अभी बाकी है


मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

सिसकना नियति है


अपने तराजुओं के पलड़ों में
वक्त के बेतरतीब कैनवस पर
हम ही राम हम ही रावण बनाते हैं
जो चल दें इक कदम वो अपनी मर्ज़ी से
झट से पदच्युतता का आईना दिखा सर कलम कर दिए जाते हैं

ये जानते हुए कि
साम्प्रदायिकता का अट्टहास दमघोंटू ही होता है
नहीं रख पाते हम 
अभिव्यक्ति के खिड़की दरवाज़े खुले

आओ चलो
कि पतंग उड़ायें अपनी अपनी बिना कन्नों वाली
कि नए ज़माने के नए चलन अनुसार
जरूरी है प्रतिरोध के दांत दिखाना भर
क्योंकि
आगे के गणित की परिकल्पनाओं पर नहीं है हक़ किसी का

सिसकना नियति है
फिर लोकतंत्र हो या अभिव्यक्ति .........

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

चेतनामयी






हैलो
मुझे वंदना गुप्ता जी से बात करनी है
जी मैं बोल रही हूँ
मैं चित्रा मुद्गल बोल रही हूँ

उफ़ ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे , दिल की धडकनें तेज हो उठीं और मैं उछल पड़ी . कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि जो सुना सही सुना . उसके बाद बात का सिलसिला शुरू हुआ जब दी ने कहा , ' वंदना , संवेदन पत्रिका में तुम्हारी कवितायें पढ़ीं जिन्होंने मुझे तुमसे बात करने को मजबूर किया , मैं रुक नहीं सकी तुमसे बात करने से .

बेशक इससे पहले हम दो - तीन बार मिल चुके थे लेकिन वो मेरे बारे में ज्यादा कुछ जानती नहीं थीं और उसके बाद उन्होंने मुझे अपने कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया .

चित्रा मुद्गल दी द्वारा संचालित ' चेतनामयी संस्था ' में डॉ कुंवर बेचैन जी की अध्यक्षता में डॉ रमा सिंह जी के साथ मुझे भी  कल ६ अक्टूबर को कविता पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ जो मेरे लिए किसी दिवास्वप्न से कम नहीं था . अपने समय की देश विदेश में जानी मानी सभी बड़ी हस्तियाँ और उन सबके बीच मुझ सी नाचीज़ को यदि ऐसा मौका मिले तो उसे स्वप्न सच होना न कहूं तो क्या कहूं समझ नहीं आ रहा . औपचारिक रूप से शाल , फूलों का गुलदस्ता और मानदेय देते हुए अतिथियों का संस्था की कर्मठ अनीता जी ने स्वागत किया और फिर ईश वंदना के साथ कार्यक्रम का आरम्भ किया गया .

चेतनामयी संस्था में सिर्फ स्त्रियों का ही साम्राज्य है जहाँ वो साहित्य को पूर्ण रूप से समर्पित हैं जिसका अंदाज़ा आपको तब होता है जब आप कविता सुनाते हैं तो हर शख्स एक एक पंक्ति को इतने ध्यान से सुनता है कि कविता के बाद उस पर अच्छा खासा विमर्श भी होता है और मेरे साथ तो ये एक ऐसा मौका था कि जो हो रहा था वो मैंने सोचा भी नहीं था .

मेरी पहली दो कवितायें ' मेरे फुंफकारने भर से ' और ' क्योंकि अपराधी हो तुम ' को तो आग्रह करके दो दो बार सुना और मैं आश्चर्यचकित इतने सुधि श्रोता पाकर . यूँ मैंने चार कवितायें सुनाईं जिसमे से एक प्रेम कविता और एक पौराणिक चरित्र गांधारी पर थी तो उस पर भी काफी विमर्श चलता रहा .

किसी भी रचनाकार के लिए वो पल अविस्मर्णीय बन जाते हैं जब अपने समय की बड़ी हस्तियों से भी दाद पाए और इतने बढ़िया श्रोता मिलें और ये मेरा एक ऐसा ही दिन था जिसने मुझे अभिभूत किया .

सबसे बड़ी बात डॉ रमा सिंह जी और डॉ कुंवर बेचैन जी के साथ ने केवल बैठना बल्कि उन्हें सुनना एक उपलब्धि से कम नहीं . रमा सिंह जी के गीतों और गजलों में जहाँ जीवन दर्शन समाया था वहीँ डॉ कुंवर बेचैन जी ने शहर और गाँव के अंतर के साथ मध्यमवर्गीय जीवन का एक ऐसा खाका पेश किया जो शायद हर घर की कहानी है लेकिन संवेदना का उच्च स्तर ही मनोभावों को छूता है . उसके बाद संक्रमण और फिर जब अंत में अपनी प्रसिद्ध कविता  ' बदरी ' सुनाई तो ज्यादातर सभी की आँख भर आई .

डॉ साहब का ये कहना कि 'मैंने अपने इतने साल के समय में ऐसा माहौल नहीं देखा' ही सिद्ध करता है कि कैसे चित्रा दी साहित्य की सच्ची सेवा कर रही हैं . चित्रा दी दिल से आभारी हूँ जो आपने मुझे इस काबिल समझा और इतने बढ़िया श्रोता उपलब्ध करवाए .
अंत में यही कह सकती हूँ सुधि श्रोता किसी भी कार्यक्रम की जान होते हैं .




अंत में सबसे बड़ी बात : ' संवेदन ' पत्रिका निकालने वाले राहुल देव की हार्दिक आभारी हूँ जो मुझे पत्रिका का हिस्सा बनाया . जिसे पढ़ स्वयं चित्रा दी का मुझे फ़ोन आया और मुझे इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का उन्होंने ये सु-अवसर दिया .

कहने को इतना है कि कहती जाऊं और बात ख़त्म न हो और शायद तब भी पूरा न कह पाऊँ लेकिन उस वजह से पोस्ट बड़ी हो जाएगी इसलिए जो ट्रेलर दिखाया है उसी से सब्र करना पड़ेगा :)

फिलहाल जो चित्र उपलब्ध हैं उन्हीं से काम चलाइये ये भी डॉ कुंवर बेचैन जी के सौजन्य से प्राप्त हुए हैं .

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

एक नयी शुरुआत के लिए

आशंका के समंदर में
हिलोर मारती लहरों से
नहीं पूछा जाता यूं उठने गिरने का सबब
जब तक कि अंदेशा न हो कोई
मगर बिना सबब नहीं होता कुछ भी
तूफ़ान से पहले के संकेत साक्षी हैं
तूफ़ान से पहले और बाद की शांति के

एक एक कर क्रमानुसार
बदल जाती हैं तस्वीरें
तुम चाहो या न चाहो
काल से बड़ा कोई काल नहीं
जो अंदेशों को सही सिद्ध कर देता है
और देता है सन्देश
जहाज के डूबने के अंदेशे पर
चूहे ही छोड़ते हैं सबसे पहले जैसे
वैसे ही ज़िन्दगी के मझधार में भी
यूं ही क्रिया प्रतिक्रियाओं के भंवर में
छोड़ जाते हैं वक्त के गाल पर अनचाहे निशान
कुछ चेहरे ,कुछ लोग , कुछ अजनबी

बस यही तो है ज़िन्दगी का फलसफा
मिलना बिछड़ना , टूटना जुड़ना
निर्माण विध्वंस
फिर पुनर्निर्माण हेतु उपक्रम
तो पकड़ो फिर एक नया सिरा
एक नयी शुरुआत के लिए
क्योंकि ..........चलना जरूरी है

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

आओ जश्न मनाएं

 
 
थोडा सा रूमानी होने को जरूरी थी
एक वाकफियत दिल की दिल से
और अब जब
किस्सों सी किश्तों में सिसकती रही मोहब्बत
तुमने डाल दी अपनी हसरतों की चादर

यूँ भरमाने के दौर तो नहीं थे
फिर भी हमने खुद को भरमा लिया
सोच , शायद मिल जाए मुझे मेरे हिस्से की दौलत

मगर किस्से कहानियों के
कब किसने तर्जुमे किये हैं
और कालखंड की
किसने सिसकारी सुनी है
जानते हुए भी
रूमानियत को जिंदा रखने को भरा है मैंने मोहब्बत का खामोश घूँट

जिस्म , न नीला पड़ा न पीला और न ही सफ़ेद
देख , रूमानियत के अहसास का असर
गुलाबों की खेती से सुर्खरू है राख भी मेरी

ये प्रेम की अद्यतन ख़ामोशी है 
आओ जश्न मनाएं

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

पखवारे भर का खेल


आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख :


चलिए एक बार फिर कर लें कोरम पूरा आखिर यही तो है औचित्य . इससे आगे न राह है न मंजिल . सिर नवाओ और आगे बढ़ जाओ यहीं तक हैं हमारी चिंताएं .

 चिंतित होना हमारा स्वभाव जो ठहरा तो कैसे गरियाए बिना रह जायेंगे . हर बार की तरह इस बार फिर मौका हाथ लगा है तो क्यों पीछे रहें , क्यों न बहती गंगा में हाथ क्या पूरी तरह नहा - धो हम भी पवित्र हो जाएँ . आखिर हम ही तो हैं खैरख्वाह और खुद को खैरख्वाह सिद्ध करने का इससे बढ़कर भला और क्या उपाय होगा जहाँ हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आ जाए .

एक दिन या है फिर तो वो ही आम दिन आम बातें हैं तो मौका भी है और दस्तूर भी इसलिए हो जाते हैं सभी स्यापा पीटने को तैयार अपने दल बल के साथ . जो जितना जोर से स्यापा पीटेगा उतना ही उस पर ध्यान जाएगा तो खैरख्वाह खुद ही सिद्ध  हो जाएगा और इसके लिए करना ही क्या है जहाँ भी किसी को कोई भी अंग्रेजी शब्द कहते देखो वहीँ फटकारना शुरू कर दो , " आज तुम्हारी ही वजह से ये हाल है हिंदी का , कैसे गिटर पिटर विदेशी भाषा में करते हो लेकिन अपनी ही भाषा से मुंह फेरकर कौन सा महान काम करते हो , भले आदमी अपनी भाषा का सम्मान करना सीख वर्ना ........ निष्कासित कर दिए जाओगे हमारे समाज से , हम तुम्हें चैन से रहने नहीं देंगे , तुम्हारा वो मखौल उड़ायेंगे कि साँस भी लोगे तो हिंदी में ही लोगे फिर ज़िन्दगी भर " . बस फिर देखो कैसे तुम ही हिंदी के महान शुभचिंतकों में गिने जाओगे फिर चाहे तुम्हारे घर में हिंदी के नाम से ही बीवी बच्चे नाक भौं सिकोड़ते हों या फिर तुम्हारे घर की कामवाली बाई भी अंग्रेजी में ही बात क्यों न करती हो . कौन जांच पड़ताल करने जायेगा भला ? मगर तुम्हारी तो निकल ही पड़ेगी न .........तुमसा शुभचिंतक पा आस पड़ोस हो या दफ्तर या साहित्य सब धन्य हो जायेंगे . आखिर कोई तो है जो हिंदी के बारे में सोचता है .........

दो चार विचार गोष्ठियां कर लो , दो चार आलेख अख़बारों आदि में छपवा दो , दो चार आन्दोलन कर लो ,बस इसी में निकल जाएगा पखवारा उसके बाद तू कौन मैं कौन . सब अपनी अपनी राह पकड़ लेंगे मगर उससे पहले तुम जरूर सबकी निगाह में आ जाओगे और अपना एक मुकाम पा जाओगे . हिंदी के महान खैरख्वाह सिद्ध हो जाओगे .

बस इतना भर ही तो है औचित्य हिंदी दिवस कहो या हिंदी पखवारे का , कौन सा तुम्हारे शोर मचाने से सत्ता बदलेगी या सोच . कौन से हर सरकारी काम हिंदी में होने लगेगा , कौन सा तुम्हारे कहने से प्रधानमंत्री हो या विदेश मंत्री या राष्ट्रपति हिंदी में बात करने लगेगा और दुभाषिये का प्रयोग करेंगे विदेशों में या फिर कौन सा वो हिंदी को संसार की भाषा बनाने के लिए संकल्प ले एक अभियान छेड़ देंगे क्योंकि जब अपने देश में ही सर्वमान्य नहीं है तो और किससे और क्या उम्मीद की जा सकती है , अपने देश में ही अलग अलग प्रान्त की अलग अलग भाषा है वहां भी हिंदी ऑप्शनल है तो कैसे संभव है तस्वीर का रुख पलटना वर्ना उनका वोट बैंक खतरे में न आ जाएगा , ऐसे निर्णय सोच समझकर लिए जाते हैं भावनाओं में बहकर नहीं तभी अभी तक हिंदी राजभाषा है राष्ट्रभाषा नही .........यहाँ न कुछ बदला है न बदलेगा . बस स्यापा करने वालों का नाम जरूर रौशन हो जाएगा और फिर अगले बरस तक के लिए विराम लग जाएगा .

ये तो नफीरी ढोल ताशे बजा हिंदी को बचाने का मौसम आया है
जिसके बाद तो बस पतझड़ का साया ही उसके हिस्से आया है

सोमवार, 7 सितंबर 2015

अच्छे से जानते हैं वो ..........

सूखे खेत चिंघाड़ते ही हैं
निर्विवाद सत्य है ये
फिर क्यों शोर मचा रही हैं
आकाश में चिरैयायें

यहाँ चौपायों पर चला करती हैं सत्ताएं
साम दाम दंड भेद की तरह
फिर क्यों हलाक हुई जा रही हो
क्या होगा आन्दोलन से
जब तक तुममे सच से आँख मिलाने की सामर्थ्य न हो

कथनी और करनी में फर्क है तुम्हारी
तुम सिर्फ शोर के उस तरफ बजाती हो बांसुरी
ताकि घायल भी न हो और बिगुल भी बजे
जबकि सत्य ये है कि
छाती पर वार झेलने वालों को ही मिला करते हैं तमगे

फिर क्यों बेवजह
ये शोर के बिगुल बजा मचा रखा है आसमां में हल्ला

किंचित फ़िक्र नहीं है तुम्हारी किसी को
क्योंकि
वो जानते हैं कैसे किये जाते हैं आन्दोलन निरस्त
अनुभवी हैं
और तुमने तो अभी रखा ही है कदम चारागाह में

मत जोड़ना इस उद्बोधन को किसी खास घटनाक्रम से
क्योंकि
देश का कोई कोना हो
या राजनीति का अघोषित युद्ध हो
या अभिव्यक्ति पर प्रहार हो
या फिर साहित्य का बिछावन हो
एक अराजकता ने लील लिया है यहाँ सभी का विवेक

सिर्फ चिमटे बजाने से नहीं पलटा करती हैं यहाँ सत्ताएं
जरा सा हुश करने भर से
जो उड़ जाया करती हैं
उनका शोर महज भोर का शोर भर ही सिद्ध हुआ करता है
अच्छे से जानते हैं वो ............

ये महज बौद्धिक विलाप के सिवा और कुछ नहीं है !!!

रविवार, 30 अगस्त 2015

मैं कोई अतिश्योक्ति नहीं

अभी तो मैं खुद अपने आप को नहीं जानती
फिर कैसे कर सकते हो तुम दावा
मुझे पूरी तरह जानने का
जबकि
मुझे जानने के लिए
तुम्हें नहीं पढने कोई कायदे
फिर वो प्रेम के हों
या द्वेष के

कभी जानने की इच्छा हो
तो छील लेना मेरी मुस्कराहट को
कतरे कतरे में उगी रक्तिम दस्तकारियाँ
बयां कर जायेंगी ज़िन्दगी के फलसफे

कभी किवाड़ों की झिर्रियों से
बहती हवा को देखा है
नहीं न ...... बस वो ही तो हूँ मैं
क्या फर्क पड़ता है
फिर वो गर्म हो या ठंडी

जब ढह जाएँ
तुम्हारी कोशिशों के तमाम पुल
तब खटखटाना दरवाज़ा
मेरी नज्मों का
मेरे लफ़्ज़ों का
मेरी अभिव्यक्ति का
जहाँ मिलेगा लिखा
' मुझे जानने को 
बस जरूरत है तो सिर्फ इतनी 
तुम संजीदा हो जाओ 
और पढ सको 
कर सको संवाद 
मूक अभिव्यक्तियों से '
क्योंकि 
यहाँ कोई दरवाज़ा ऐसा नहीं 
जिसे खोला न जा सके 
फिर वो खुदा ही क्यों न हो 

मैं कोई अतिश्योक्ति नहीं
कि जिसके बाद कोई विकल्प न बचे 

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

दो टुकड़ा

1
चकनाचूर होकर टूटी रात की किरचें
न हथेलियों में चुभेंगी न जिस्म में
दिल और रूह की नालिशबंदी में
जरूरी तो नहीं कतरा लहू का निकले ही
चुभन ने बदल दी हैं दरो - दीवार की मश्कें

अब मोहब्बत से मोहब्बत करने के रिवाज़ कहाँ ?
तभी 
मेरी रात के खातों में दिनों का हिसाब लिपिबद्ध नहीं ...


2

दिन नदीदों सा अक्सर मुंह बाए चला आता है 

रातें उनींदी सी अक्सर मुंह छुपाए चली जाती हैं 

जाने कैसी पकड़ी है सुबहो शाम ने जुगलबंदी 

बेख़ौफ़ ज़िन्दगी का हर तेवर नज़र आता है