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शनिवार, 26 दिसंबर 2009

गिले -शिकवे

इक प्यासी रूह को
सुकून कब मिला है

घुटन की दलदल में फंसी
ज़िन्दगी का यही सिला है

चेहरे पर उभरती लकीरों में
दर्द का ही सिलसिला है

कुछ पल ठहर जाऊं कहीं
ज़िन्दगी का बस यही गिला है

रविवार, 6 दिसंबर 2009

दबी चिंगारी को हवा मत दो............६ दिसम्बर

मरा इक शख्स था
हुए बरबाद
न जाने कितने थे
उस एक चेहरे को ढूंढती
निगाहें आज
न जाने कितनी हैं
गम का वो सूखा
ठहरा आज भी
हर इक निगाह
में है
सियासत की ज़मीन
पर बिखरी
लाशें हजारों हैं
राम के नाम पर
राम की ज़मीन
हुई लाल है
धर्म के नाम पर
ठगी ज़िन्दगी
आज नाराज है
कैसे ये क़र्ज़ चुकाओगे
कैसे फिर फ़र्ज़ निभाओगे
लहू के दरिया में बही
मानवता फिर आज है
कैसे एक दिन के लिए
सियासत यूँ चमकती है
बरसों से जमी
यादों की परतें
कैसे मिटाओगे
सीने में दबी
चिंगारी को हवा
दिया नही करते
जो भड़के
अबकी शोले
फिर कैसे बुझाओगे ?

बुधवार, 25 नवंबर 2009

कैसे करूँ नमन ?

शहीदों को नमन किया
श्रद्धांजलि अर्पित की
और हो गया कर्तव्य पूरा


ए मेरे देशवासियों
किस हाल में है
मेरे घर के वासी
कभी जाकर पूछना हाल उनका


बेटे की आंखों में
ठहरे इंतज़ार को
एक बार कुरेदना तो सही
सावन की बरसात
तो ठहर भी जाती है
मगर इस बरसात का
बाँध कहाँ बाँधोगे
कभी बिटिया के सपनो में
झांकना तो सही
उसके ख्वाबों के
बिखरने का दर्द
एक बार उठाना तो सही
कुचले हुए
अरमानों की क्षत-विक्षत
लाश के बोझ को कैसे संभालोगे?


कभी माँ के आँचल
को हिलाना तो सही
दर्द के टुकड़ों को न समेट पाओगे
पिता के सीने में
जलते अरमानो की चिता में
तुम भी झुलस जाओगे

कभी मेरी बेवा के
चेहरे को ताकना तो सही
बर्फ से ज़र्द चेहरे को
एक बार पढ़ना तो सही
सूनी मांग में ठहरे पतझड़ को
एक बार देखना तो सही
होठों पर ठहरी ख़ामोशी को
एक बार तोड़ने की
कोशिश करना तो सही
भावनाओं का सैलाब जो आएगा
सारे तटबंधों को तोड़ता
तुम्हें भी बहा ले जाएगा
तब जानोगे
एक ज़िन्दगी खोने का दर्द

चलो ये भी मत करना 
बस तुम कुछ तो जिंदा खुद को कर लेना 
मेरी बीवी मेरे बच्चे 
मेरी माँ मेरे पिता 
सबके चेहरे पर मुस्कान खिल जायेगी 
जिस दिन शहादत के सही मायने तुम्हें समझ आयेंगे 
और तुम 
अपने घर में छुपे गद्दारों से दो - दो हाथ कर पाओगे 

पडोसी मुल्क जिंदाबाद के नारों 
और आतंकवादी की मृत्यु के विरोध में 
उठती आवाजों से
जिस दिन तुम्हारे कान फट जायेंगे 
विद्रोह के बीज के साथ 
देशभक्ति के बीज तुम्हारी नस्लों में बुब जायेंगे 
मेरी शहादत आकार पा जायेगी 
देश की मिटटी देश के काम आयी 
सोच , मेरी रूह सही मायनों में 
उस दिन सुकून पाएगी 

क्योंकि तुम
तब शायद समझ पाओगे
कर्तव्य सिर्फ़ नमन तक नही होता
सिर्फ़ नमन तक नही होता....

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

मत ढूँढ बाहर

उस एक स्वरुप में
क्यूँ न खोजा तूने
जो दूसरे में पाना
चाहता है
मानव तू क्यूँ
भटकना चाहता है
भावों के दलदल में
क्यूँ धँसता जाता है
तेरे हर ख्वाब की
ताबीर वहीँ है
हर चाहत का
हासिल वही है
हर राह की
मंजिल वही है
फिर क्यूँ तू
मरुभूमि में
जल के कण
ढूंढ़ना चाहता है
क्यूँ सागर से
प्यास बुझाना
चाहता है
तेरा चाँद तेरे साथ है
फिर क्या भटकने की बात है
खोज , जो खोजना है
पा , जो पाना चाहता है
दे , जो देना चाहता है
मगर सिर्फ़
उसी स्वरुप में
उसी दिव्य रूप में
जो तेरे साथ है
तेरे पास है
फिर क्यूँ तुझे
झूठे प्यार की तलाश है
मृगतृष्णा को छोड़
उस कच्चे धागे की
डोर से बंधकर
तो देख एक बार
हर ओर
रौशनी होगी
सितारों सी चमक होगी
बहारों की महक होगी
मत ढूंढ बाहर कहीं
तेरा महबूब
उसी स्वरुप में
तुझे मिल जाएगा
जिसे तूने कभी
चाहने की कोशिश न की
जिसके अंतस में
दिया कभी जलाया ही नही
एक बार
तू कोशिश तो कर
फिर दूसरा न कोई रूप
दूसरा न कोई स्वरुप
तुझे दिख पायेगा
तेरा अपना महबूब ही
उसमें मिल जाएगा
तू एक बार
उसके अंतस में
उतर कर तो देख

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही
आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को
नासूर बनाओ तो सही
प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

कोई तो कारण रहा होगा

क्यूँ तेरी याद फिर आई है
लगता है
तुमने मुझे पुकारा है
किस दर्द ने फिर दस्तक दी है
तभी तो
हूक मेरे दिल में भी उठी है
तेरे गम से जुदा
मेरा दर्द कब था
तेरी इक आह पर
दर्द मेरा सिसकता है
लगता है
फिर कोई ज़ख्म उधड गया है
तभी तो
तेरी इक सिसकी पर
रूह मेरी कसमसाई है
कोई तो कारण रहा होगा
यूँ ही तो तेरी याद नही आई है

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

ये कैसा है पोरुष तेरा

ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अबला की लुटती लाज देख
जो बहरा बन , मूक हो
नज़र चुरा चला जाए
करुण पुकार भी न
जिसका ह्रदय विदीर्ण
कर पाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अत्याचारों की बानगी देख
असहाय , निर्दोष की
हृदयविदारक चीख सुन भी
जो सिर्फ़ तमाशाई बन जाए
दयनीय हालत देखकर भी
जिसका सीना पत्थर बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

राजनीति की बिसात पर जो
चापलूसी की नीति अपनाए
अन्याय के खिलाफ जो
कभी आवाज़ न उठा पाए
नेताओं के हाथों की जो
ख़ुद कठपुतली बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

पत्नी की चाहत को जो
अपना न बना पाए
उसके रूह के द्वार की कभी
किवडिया ना खडका पाए
अपने ही अभिमान में चूर
अर्धांगिनी की जगह न दे पाए
पत्नी पर ही अपने पोरुष का
जो हर पल झंडा फहराए
अपने अधिकारों का
अनुचित प्रयोग कर जाए
अपने मान की खातिर
भार्या का अपमान कर जाए
अपने झूठे दंभ की खातिर
ह्रदय विहीन बन जाए
कैसा वो पुरूष होगा
और कैसा उसका पोरुष
किस पोरुष की बात हो करते
किस दंभ में हो फंसे
जागो , उठो
एक बार इन्सान तो बन जाओ
नपुंसक जीवन को छोड़
एक बार पुरूष ही बन जाओ
एक बार पुरूष ही बन जाओ

रविवार, 27 सितंबर 2009

तेरे आने से

कभी मिलोगी?
साँस छूटने से पहले मुझसे
पकडोगी हाथ मेरा
मौत का हाथ पकड़ने से पहले
बस इतनी सी इल्तिजा है
इक नज़र देख लूँ तुमको
और सुकून की नींद सो जाऊँ
फिर न जगाने आए कोई
कब्र पर मेरी
कोई फूल भी न चढाये
तमाम हसरतें, आरजुएं
इक दीदार के साथ
तमाम हो जाएँगी
मेरा उम्र भर का इंतज़ार
करार पा जायेगा
सिर्फ़ एक बार
तेरे आने से ...................

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

हश्र यही होना है

ज़रा पूछ तो हाल
शाख पर लटके
उस सूखे हुए पत्ते का
ज़रा देख तो उस ओर
ज़िन्दगी के बसंत तो
उसने भी देखे थे
सावन की रिमझिम फुहारों में
वो भी तो भीगा था
मौसम का हर रंग
उस पर भी तो चढा था
ज़िन्दगी की रंगीनियों का आनंद
उसने भी तो लिया था
पर अब देख उसका हाल
कैसा अलग -थलग सा
पड़ गया है
ज़िन्दगी का हर गम
वो झेल चुका है
हर तूफ़ान से
वो लड़ चुका है
ज़रा देख
उसकी खामोशी
सब बयां कर देगी
नज़रे उसकी तुझे भी
घायल कर देंगी
सिर्फ़ एक झोंका उसे
शाख से तोड़ देगा
और ज़िन्दगी से
नाता तोड़ देगा
ज़रा देख उस ओर
हश्र तेरा भी इक दिन
यही होना है ..............

बुधवार, 2 सितंबर 2009

आँख तो फिर भी भर आई होगी

कुछ अश्क तो झड़ते होंगे
आँख से तेरी भी
कुछ कहानी
मेरी भी तो
कहते होंगे
दर्द जो दिया तूने
उसे इक नया
नाम तो देते होंगे
यादों को मेरी
तेरी यादों में
संजोते तो होंगे
जो पल
साथ बिताये थे
याद दिलाते होंगे
कभी रुलाते होंगे
कभी हँसाते होंगे
कभी यादों के नश्तर
चुभाते तो होंगे
कभी ज़ख्म हरे
होते तो होंगे
कहीं कोई नासूर
भी तो होगा
उसे कुरेदते तो होंगे
अश्क मरहम बन वहां
टपक तो जाते होंगे
मुझे तडपाने की चाह में
क्या तू न तड़पता होगा
मुझे रुलाने की चाह में
क्या तू न रोता होगा
कुछ यादों के कफ़न
उम्र भर ओढ़ने पड़ते हैं
कहीं तू भी तो भटका होगा
मेरी चाह में
कभी तो सिसका होगा
एक टीस बन
दर्द कभी तो
छलछलाता होगा
कुछ न कुछ तो
दिल तेरा भी
बुदबुदाता होगा
मेरे दर्द की याद में
कुछ चाहतें तेरी भी तो
कसमसाई होंगी
कभी याद न आई हो मगर
आँख तो फिर भी
भर आई होगी
आँख तो फिर भी
भर आई होगी ............

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

इक अनाथ का दर्द

मैं अनाथ हूँ तो क्या
मुझे न मिलेगा प्यार कभी
किसी की आँख का तारा
क्या कभी बन पाऊंगा
किसी के घर आँगन में
फूल बन मह्कूंगा कभी


ओ दुनिया वालों
मैं भी तो इक बच्चा हूँ
माना तुम्हारा खून नही हूँ
न ही संस्कार तुम्हारे हैं
फिर भी हर बाल सुलभ
चेष्टाएं तो हैं मेरी भी वही
क्या संस्कार ही बच्चे को
माँ की गोद दिलाते हैं
क्या खून ही बच्चे को
पिता का नाम दिलाता है
क्या हर रिश्ता केवल
खून और संस्कार बनाता है

तुम तो सभ्य समाज के
सभ्य इंसान हो
फिर क्यूँ नही
मेरी पीड़ा समझ पाते हो
मैं भी तरसता हूँ
माँ की लोरी सुनने को
मैं भी मचलना चाहता हूँपिता की ऊँगली पकड़
मैं भी चलना चाहता हूँ
क्या दूसरे का बच्चा हूँ
इसीलिए मैं बच्चा नही
यदि खून की ही बात है तो
खुदा ने तो न फर्क किया
फिर क्यूँ तुम फर्क दिखाते हो
लाल रंग है लहू का मेरे भी
फिर भी मुझे न अपनाते हो
अगर खून और संस्कार तुम्हारे हैं
फिर क्यूँ आतंकियों का बोलबाला है
हर ओर देश में देखोआतंक का ही साम्राज्य है
अब कहो दुनिया के कर्णधारों
क्या वो खून तुम्हारा अपना नही

एक बार मेरी ओर निहारो तो सही
मुझे भी अपना बनाओ तो सही
फिर देखना तुम्हारी परवरिश से
ये फूल भी खिल जाएगा
तुम्हारे ही संस्कारों से
दुनिया को जन्नत बनाएगा
बस इक बार
हाथ बढाओ तो सही
हाथ बढाओ तो सही

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

भावसागर

मैं तो इक तन हूँ
बस मन ही बुला रहा है
भावों में बसे हो तुम
बस दिल ही लुभा रहा है
मैं तो सिर्फ़ चंदा हूँ
बस चकोर ही बुला रहा है
शमा के हुस्न में जलने को
परवाना ही चला आ रहा है
मैं तो इक मूरत हूँ
तुम्हें ही खुदा नज़र आ रहा है
पत्थरों में दीदार करने को
बस ख्याल ही बुला रहा है
मैं तो सिर्फ़ पुष्प हूँ
बस भ्रमर ही ललचा रहा है
कलियों के सौंदर्य में डूबने को
खिंचा चला आ रहा है
मैं तो इक नदिया हूँ
बस सागर ही बुला रहा है
भावों के गहन सैलाब में
बस ह्रदय ही गोते खा रहा है
मैं तो इक तन हूँ
बस मन ही बुला रहा है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

प्रेम की सर्पीली डगर

प्रेम के बंधन में बंधे
कभी मोहन है , कभी श्यामा है
प्रेम की सर्पीली डगर
कौन समझा है , कौन जाना है
प्रेम में प्रेमी का रुख
कभी तोला है , कभी माशा है
प्रेम के पलडों में तुले
कभी मीरा है , कभी राधा है

रविवार, 9 अगस्त 2009

एक बेटी की पीड़ा ----------कब आओगी तुम

माँ
कहाँ हो तुम ?
जाने से पहले
यूँ भी न सोचा
तुम्हारे बाद
मेरा क्या होगा?
कौन मुझे चाहेगा?
कौन मुझे दुलारेगा ?
मेरे होठों की हँसी के लिए
कौन तड़प -तड़प जाएगा
मेरी इक आह पर
कौन सिसक- सिसक जाएगा

पिता ने तो अपनी
नई दुनिया बसा ली है
अब तो नई माँ की हर बात
उन्होंने मान ली है
तुम ही बताओ
अब कहाँ जाऊँ मैं
किसे माँ कहकर पुकारूँ मैं
यहाँ पग-पग पर
ठोकर और गाली है
तुम्हारी लाडली के लिए अब
कोई जगह न खाली है

माँ , कहाँ हो तुम ?
क्या मेरे दर्द को नही जानती
क्या अब तुम्हें दर्द नही होता
अपनी बेटी की पीड़ा से
क्या अब तुम्हारा
दिल नही रोता
क्यूँ चली गई जहान छोड़कर
मुझे भरी दुनिया में
अकेला छोड़कर
किस्से अपने सुख दुःख बाटूँ
कैसे मन के गुबार निकालूं
कौन है जो मेरा है ?
ये कैसा रैन-बसेरा है ?
जहाँ कोई नही मेरा है

अब तो घुट-घुट कर जीती हूँ
और खून के आंसू पीती हूँ
जिस लाडली के कदम
जमीं पर न पड़े कभी
वो उसी जमीं पर सोती है
और तुम्हारी बाट जोहती है
इक बार तो आओगी तुम
मुझे अपने गले लगाओगी तुम
मुझे हर दुःख की छाया से
कभी तो मुक्त कराओगी तुम
बोलो न माँ
कब आओगी तुम ?
कब आओगी तुम?

बुधवार, 5 अगस्त 2009

अजीब नाता

देखा कैसा अजीब सा नाता है
दूर होकर भी पास होते हैं
एक दूसरे को न देखकर भी देखते हैं
बिना बात किए भी बतियाते हैं
कसक सी दिल में लिए
होठों को सिए रखते हैं
मुलाक़ात की चाह में
रोज दीदार को आते हैं
पर तेरे दर-ओ-दीवार
रोज ही बंद नज़र आते हैं
चाह उतनी ही उत्कट उधर भी है
ये मालूम है मगर
तेरे अहम् के नश्तर ही
तुझे भी रुलाते हैं
ये घुटती हुई खामोशी
इसकी सर्द आवाज़
दिल के तारों पर
दर्द बन ढल जाती है
बिना आवाज़ दिए भी
दोनों के दिल गुनगुनाते हैं
देखा कैसा अजीब सा नाता है

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

ख्वाबों के घरोंदे

आज कुछ
ख्वाबों को

दिल की
धरती पर
बोया है
आशाओं के
बीजों को
दिल की मिटटी में
कुछ ऐसे
बो दिया
कि जैसे कोई
आशिक
अपनी महबूबा
की हसरत में
ख़ुद को
मिटा देता हो
अब इसमें
हर सपने की
एक-एक
कणिका को
खाद बनाया है
जैसे कोई
स्वर्णकार
किरच-किरच
सोने की
संभाले जाता हो
और उसमें
दिल के हर
अरमान की
बूँद - बूँद का
पानी दिया है
जैसे कोई
मूर्तिकार
अपनी शिल्प में
आखिरी हीरा
जड़ रहा हो
अब तो बस
इंतज़ार है
उस पल का
जब आशाओं की
फसल लहलहाएगी
दिल की धरती भी
महक-महक जायेगी
हर ख्वाब को
उसकी ताबीर मिल जायेगी

सोमवार, 27 जुलाई 2009

यादें

कभी कभी जरूरतें याद ले आती हैं
वरना याद किसी को किसी की कब आती है

यादों में बसर किसी की तभी किया करते हैं
जब कोई किसी के दिल में घर किया करते हैं

यादों के सहारे ज़िन्दगी गुजारने वाले
ऐसे चेहरे कम ही हुआ करते हैं

किसी की याद में जीने मरने वाले
न जाने किस मिटटी के बना करते हैं

यादों की दहलीज पर पाँव रखते ही
न जाने कितने नश्तर सीने में चुभा करते हैं

शाम होते ही यादों की अर्थी सजा लेते हैं
रात भर यादों की चिता में जला करते हैं

रविवार, 19 जुलाई 2009

बिना कारण ही

बिना कारण भी
दिल उदास होता है
बिना कारण भी
कोई आस - पास होता है
कभी ख्यालों में
दस्तक देता है
कभी ख्वाबों में
दिखाई देता है
बिना कारण भी
नज़रों को धोखा होता है
पलकों की चिलमन में
बिना कारण भी
कोई क़ैद रहता है
पलकों के गिरने उठने की गति
सांसों की डोर ठहरा जाती है
बिना कारण ही
कई बार ऐसा भी होता है
साँसे थम सी जाती हैं
नब्ज़ भी रुकने लगती है
मगर बिना कारण
तब भी दिल धड़कता रहता है
किसी की आहट पर
बिना कारण ही
भटकता रहता है
कभी जज़्बात लरजने लगते हैं
कभी अरमान बहकने लगते हैं
बिना कारण ही
कभी जीवन महकने लगता है
कई बार ऐसा भी होता है
बिना कारण ही
कई बार ऐसा भी होता है

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ज़िन्दगी तू एक अबूझ पहेली है

ज़िन्दगी
तू एक अबूझ पहेली है
जितना सुलझाओ
उतनी उलझती है
कभी पास लगती है
तो कभी दूर
इतनी दूर
कि जिसका
पार नही मिलता

ज़िन्दगी
तू एक ख्वाब है
कभी सब सच लगता है
तो कभी ख्वाब सी
टूटती बिखरती है

ज़िन्दगी
तू एक मौसम है
कभी बसंत सी महकती है
तो कभी शिशिर सी
जकड़ती है
कभी सावन सी
रिमझिम बरसती है
तो कभी ग्रीष्म सी
दहकती है

ज़िन्दगी
तू एक भंवर है
जिसके अथाह जल में
हर घुमाव पर
सिर्फ़ और सिर्फ़
डूबना ही है
अनन्त में
खोने के लिए

ज़िन्दगी
तू सिर्फ़ ज़िन्दगी है
न ख़ुद जीती है कभी
न रूकती है कभी
बस सिर्फ़ और सिर्फ़
चलती ही रहती है
एक अनदेखी
अनजानी
दिशा की ओर
मंजिल की तलाश में
और मंजिल
रेगिस्तान में पानी के
चश्मे की तरह
बस कुछ दूर और
कुछ दूर और
दिखाई देती है
मगर
न रेगिस्तान में
कभी पानी मिलता है
और न ही कभी
ज़िन्दगी को मंजिल

सच ज़िन्दगी
तू एक अबूझ पहेली है

रविवार, 12 जुलाई 2009

दिल की खोज

उदास है दिल
न जाने क्यूँ
किसे खोजता है
किसकी तलाश है
शायद ये भी अब
किसी गहरे
सागर में डूब
जाना चाहता है
शायद ये भी
सागर की तलहटी में
छुपे किसी अनमोल
मोती की तलाश में है
या फिर शायद
ये भी सागर के अंतस की
अनन्त गहराई में
खो जाना चाहता है
जहाँ खुद को पा सके
कुछ पल अपने लिए
सुकून के खोज सके
आख़िर दिल दिल ही है
कब तक सब कुछ झेलेगा
कभी तो खुद को भी टटोलेगा
कभी तो अपने को भी खोजेगा
इस दिल की पीड़ा को
कोई क्या समझेगा
दिल भी आख़िर दिल ही है
कभी तो जीना सीखेगा
कब तक खिलौना बन भटकेगा
अब तो खुद के लिए भी
एक किनारा ढूंढेगा
कहीं तो ठोर पायेगा
और तब शायद
उसका वजूद भी
उसमें ही सिमट जाएगा


गुरुवार, 9 जुलाई 2009

शब्दों का आमंत्रण

शब्दों के आमंत्रण पर
मैं बिन डोर
खिंची चली आती हूँ
शब्दों के सागर में फिर
बिन पतवार
नाव चलाती हूँ
कभी डूबती हूँ
कभी उतराती हूँ
तो कभी शब्दजाल के
भंवर में फंस जाती हूँ
शब्दों की आँख मिचोनी में
कभी शब्द विलीन हो जाते हैं
तो कभी मैं कहीं खो जाती हूँ
फिर शब्द खोजते हैं मुझको
और मैं शब्दों की चादर
ओढ़ सो जाती हूँ
शब्दों के संसार में
बिन पहचाने
शब्दों को खोजने जाती हूँ
शब्दों की गहन भाषा को
मैं बिन जाने भी
जान जाती हूँ
कभी शब्द मेरे हो जाते हैं
कभी मैं शब्दों की हो जाती हूँ
कभी शब्द मुझको छूते हैं
कभी मैं शब्दों में खो जाती हूँ
इस शब्दों के अनोखे खेल में
मैं शब्दों से लाड लड़ती हूँ
शब्दों के मीठे आमंत्रण पर मैं
बिन डोर खिंची चली आती हूँ

बुधवार, 1 जुलाई 2009

उन्हें शिकायत है हमसे

उन्हें शिकायत है हमसे
ख़ुद ही ज़ख्म देते हैं
ज़ख्मों पर मरहम नही
नमक छिड़कते हैं
टीस उठने पर
आह भी करने नही देते
आँख में आंसू आने पर
टपकने भी नही देते
फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

कभी बेवफाई का
इल्जाम लगाते हैं
मगर ख़ुद ही
वफ़ा की गली से
कभी गुजरे नही
रंग वफ़ा के
होते हैं क्या
उनमें भी जो न डूबे कभी
और फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

अपना हाल-ए-दिल
बयां कर जाते हैं
किसी के दिल पर
क्या गुजरी
ये भी न जाना कभी
उसके दिल का हाल
जाने बिना
उसके दर्द को
और बढ़ा जाते हैं
फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

सिर्फ़ अपने लिए
जीते हैं जो
अपनी ही चाहत को
जानते हैं जो
किसी की भावनाओं को
न समझें जो
चाहत जिसके लिए
खुदगर्जी का
इक व्यापार हो
पग-पग पर
आहत कर दे जो
होठों की हंसीं
को भी सीं दे जो
और उस पर
उफ़ भी न करने दे जो
अंतःकरण में भी
न सिसकने दे जो
मर - मरकर भी
जो न जीने दे
उस पर भी
इल्जाम हो ये
कि
उन्हें शिकायत है हमसे

शनिवार, 27 जून 2009

क्यूँ नेह बढाते हो

क्यूँ नेह बढाते हो
मैं तो पत्थर हूँ
पत्थरों में स्पंदन नही होता
एक ऐसी जड़ हूँ
जिसमें जीवन नही होता
वो नदिया हूँ
जिसमें बहाव नही होता
वो आकाश हूँ
जिसका कोई दायरा नही होता
वो ठूंठ हूँ
जिस पर कोई फूल नही खिलता
वो साज़ हूँ
जिसमें कोई आवाज़ नही होती
वो सुर हूँ
जिसकी कोई ताल नही होती
वो ज़ख्म हूँ
जिसकी कोई दवा नही होती
वो ख्वाब हूँ
जिसकी कोई ताबीर नही होती
वो कोशिश हूँ
जो कभी पूरी नही होती
वो दीया हूँ
जिसमें बाती नही होती
वो चिराग हूँ
जिसमें रौशनी नही होती
वो शाम हूँ
जिसकी कोई सुबह नही होती
फिर क्यूँ नेह
बढाते हो ................

शुक्रवार, 19 जून 2009

ये जानती हूँ मैं

एक मुलाक़ात का
वादा चाहा उसने
मैं दे न सकी
मिलने की ख्वाहिश थी
फिर भी
मैं मिल न सकी
कुछ तो चोट लगी होगी
उसे भी
ये जानती हूँ मैं
मगर मेरी मजबूरियां
भी कम न थी
ये वो भी जानता होगा
अपनी ख्वाहिशों को
कैसे जब्त किया होगा
उसने
दिल पर अपने पत्थर
कैसे रखा होगा उसने
खामोशी का ज़हर
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
मगर
कहीं बेपर्दा न हो जाऊँ
मेरी खातिर वो
कैसे जिया होगा
ये जानती हूँ मैं
दर्द के सैलाब से
गुज़र गया होगा
टीस चेहरे पर
आंखों में भी
न उतारी होगी
ये जानती हूँ मैं
कहीं कोई पढ़ न ले
कोई जान न ले
इस बेनामी
रिश्ते के
अनकहे
अनछुए
उसके जज्बातों को
इसलिए ज़हर का ये
कड़वा घूँट
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
पल-पल कितनी मौत
मर-मर कर
जिया होगा
हँसी का कफ़न
चेहरे को उढाकर
कैसे हँसा होगा
ये जानती हूँ मैं

शुक्रवार, 12 जून 2009

क्या यह बालश्रम नही ?

बाल श्रम के बारे में न जाने कब से बातें हो रही हैं और कभी कभी इसके खिलाफ कदम भी उठाये जाते हैं सब जानते हैं बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध है मगर क्या इसका सही ढंग से पालन किया जाता है ? क्या इसमें भेदभाव नही किया जाता?

आज मानवाधिकार आयोग बाल श्रम के ख़िलाफ़ कदम उठाता है । सरकार भी अपनी तरफ़ से भरसक कोशिश करती है मगर तब भी बाल श्रमिक हर जगह मिलते हैं । सवाल उठता है बाल श्रम किस पर लागू होता है ? क्या सिर्फ़ निचले तबके पर ही या फिर हर तबके पर , फिर चाहे वो ऊंचा तबका ही क्यूँ न हो ।

एक निचले तबके वाला बच्चा तो अपने जीने के लिए, दो वक्त की रोटी के लिए श्रम करता है । मगर ऊंचे तबके के लोग क्यूँ अपने बच्चों से काम करवाते हैं या फिर वो बच्चे काम क्यूँ करते हैं ? क्या उन्हें भी पैसों की उतनी ही जरूरत है जितनी कि निचले तबके के बच्चों को।
क्या यह बालश्रम नही ?

आज देखा जाए तो हर दूसरे सीरियल में , विज्ञापनों में बच्चे काम करते नज़र आते हैं। क्या ये बाल श्रम नही ?

एक तरफ़ तो एक बच्चा अपने जीने के लिए, पेट भरने के लिए काम करता है तो उसे पकड़ कर बाल सुधार गृह आदि में डाल दिया जाता है और दूस्रती तरफ़ सबकी आंखों के सामने , खुलेआम हम सब बच्चों को काम करते देखते हैं टेलिविज़न आदि पर , जबकि उन्हें पैसे की या कहो जिंदा रहने के लिए पैसे कमाने की उतनी जरूरत नही होती जितनी कि निचले तबके के बच्चों को होती है , फिर भी उनके खिलाफ न तो सरकार न ही मानवाधिकार आयोग कोई कदम उठता । क्या ये बालश्रम नही ?
अगर नही है तो फिर उन बच्चों को भी नही रोका जाना चाहिए जो जिन्दा रहने के लिए काम करते हैं और अगर रोका जाता है तो सरकार को उनके खाने पीने, रहने आदि के लिए इंतजाम करना चाहिए । या फिर कानून सबके लिए एक जैसा बनाया जाना चाहिए और एक जैसा ही लागू किया जाना चाहिए।

सिर्फ़ कानून को बनाना ही काफी नही है बल्कि उसको सफलता पूर्वक लागू भी किया जाए यह भी देखना सरकार का काम है । इसके साथ देश कि जनता को भी जागरूक होना चाहिए सिर्फ़ अपने खुशी के लिए अपने बच्चों को पैसा कमाने की होड़ में इस नाज़ुक उम्र में ही नही लगा देना चाहिए। उनके बचपन को उन्हें जी लेने देना चाहिए , ये तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है ।

बच्चे हैं हम
हमें जीने दो
रोटी , कपड़े
के लालच में
न ज़हर हमारे
बचपन में घोलो
क्या बचपन मेरा
फिर आएगा
दो घूँट खुशी के
पी लेने दो
बच्चे हैं हम
हमें जी लेने दो

आज इंसान को चाहिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को थोड़ा कम करे और बच्चों को बच्चा ही रहने दे ।
बाल श्रम कानून सब पर एक जैसा ही लागू होना चाहिए क्यूंकि बच्चे तो सिर्फ़ बच्चे हैं फिर चाहे वो किसी भी तबके के हों ।

रविवार, 7 जून 2009

तड़पता तो तू भी होगा

नींद तुझे भी न आती होगी
तू भी करवट बदलता होगा
मुझे खामोश करने वाले
तू कौन सा चैन से सोता होगा

दिल तो तेरा भी तड़पता होगा
आँख तो तेरी भी रोती होगी
मुझे बेवफा कहने वाले
तू कौन सा बफा निभाता होगा

कसक तो तेरे सीने में भी उठती होगी
मिलन को निगाह तरसती होगी
मुझे बेचैन करने वाले
तू कौन सा चैन से रहता होगा

क्या मुझे हर मोड़ पर ना ढूंढता होगा
मेरे निशां को तरसता होगा
मेरा नामोनिशां दिल से मिटाने वाले
क्या ख़ुद के निशां कहीं पाता होगा

सोमवार, 1 जून 2009

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

मैं - किसके लिए क्या हूँ ?
मेरा क्या अस्तित्व है ?
आज प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।

ज़िन्दगी के हर पड़ाव पर हर रूप में कभी सिर्फ़ मेरा ही अस्तित्व था । बिना मेरी सहमति के , बिना मेरी इच्छा के कोई कार्य नही होता था । जैसे सबके जीवन की धुरी थी मैं । एक सुकून सा था दिल में । कभी पति की सहचरी बनी,कभी उसकी दोस्त , कभी उसके जूनून का शिकार हुयी तो कभी उसके अहम् का । मगर हर रूप में उसका साथ देती ही गई और हर ज्यादती भी बर्दाश्त करती गई । कभी बच्चों के लिए सिर्फ़ माँ बनी तो कभी उनकी दोस्त। हर हाल में जीना सिखाया , ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया , गिरने पर अपने आँचल का साया दिया । हर पल बच्चों और पति की खुशियों में बंटती रही । उन्ही की खुशियों के लिए जीती रही , मरती रही । हर गम हर आंसू पीती गई , सहती गई और उफ़ भी नही की ।
और आज उम्र के इस पड़ाव पर सब ओर से दुत्कारी गई । कभी जिस पति का अस्तित्व थी उसी के लिए बेनाम हो गई । कभी जिन बच्चों के लिए ज़िन्दगी की हर खुशी हँसते हँसते न्योछावर करती गई आज उनके जीवन में एक अवांछित वस्तु के सिवा कुछ भी नही ।
क्या ज़िन्दगी भर की तपस्या का यही फल मिलता है ? एक कांच के टूटे हुए टुकडों सा दिल बंटता है । आज लगा किसके लिए जीती रही ?क्यूँ अपना जीवन कुर्बान करती रही ? क्या उनके जीवन में आज मेरा कोई अस्तित्व ही नही ? फिर ज़िन्दगी से मैंने क्या पाया ? ज़िन्दगी भर सिर्फ़ देती ही रही-कभी प्यार , दुलार , ममता तो कभी आर्शीवाद। मगर उसका सिला आज ये मिला ।

क्या आज मैं घर के कोने में पड़ी एक अवांछित वस्तु से ज्यादा नही ?
क्या अब मुझे इस सत्य को स्वीकारना होगा ?
क्या मुझे अब ज़िन्दगी को गुजारने के लिए एक नए सिरे से सोचना होगा ?
क्या कभी मेरा भी कोई अस्तित्व होगा ?
न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।
शायद अब उम्र के इस पड़ाव पर इन प्रश्नों का उत्तर खोजना होगा ।

शनिवार, 30 मई 2009

गंध महकती है

गंध महकती है
कभी तेरे अहसासों की
कभी तेरे ख्यालातों की
कभी अनछुई देह की
कभी अनछुए जज्बातों की
कभी बहकती साँसों की
कभी शबनमी आंखों की
कभी कुंवारे रुखसारों की
कभी मचलते शरारों की
कभी शबनमी मुलाकातों की
कभी लरजते अधखुले लबों की
कभी लहराते गेसुओं की
कभी बलखाती तेरी चालों की
कभी लहराते आँचल की
कभी मदमाती चितवन की
गंध महकती है तेरी
बस गंध महकती है

गुरुवार, 28 मई 2009

अंतर्द्वन्द

उदासियों ने आकर घेरा है
शायद किसी द्वंद का फेरा है
अंतर्द्वन्द से जूझ रही हूँ
आत्मा से ये पूछ रही हूँ
ये किन गलियों का फेरा है
ये किसके घर का डेरा है
कौन है जो नज़रों में समाया रहता है
और मिलकर भी नही मिलता है
ये किसकी तड़प तडपाती है
हर पल किसकी याद दिलाती है
ये किसकी छवि दिखाती है
और फिर मटमैली हो जाती है
न जाने किस भ्रमजाल में उलझ रही हूँ
किसका पता मैं पूछ रही हूँ
यही नही समझ पाती हूँ
रो-रो आंसू बहाती हूँ
किसकी गलियों में घूम रही हूँ
दर-दर माथा टेक रही हूँ
कोई भी ना समझ पाता है
किसका ठिकाना ढूंढ रही हूँ
ये किस द्वंद में फंस गई हूँ
ये किस द्वंद में डूब गई हूँ
किसकी राह मैं देख रही हूँ
किसकी चाह में उलझ रही हूँ
कुछ भी समझ न आता है
ये किन गलियों का फेरा है

गुरुवार, 21 मई 2009

माँ ममता और बचपन

माँ की ममता एक बच्चे के जीवन की अमूल्य धरोहर होती है । माँ की ममता वो नींव का पत्थर होती है जिस पर एक बच्चे के भविष्य की ईमारत खड़ी होती है । बच्चे की ज़िन्दगी का पहला अहसास ही माँ की ममता होती है । उसका माँ से सिर्फ़ जनम का ही नही सांसों का नाता होता है । पहली साँस वो माँ की कोख में जब लेता है तभी से उसके जीवन की डोर माँ से बंध जाती है । माँ बच्चे के जीवन के संपूर्ण वि़कास का केन्द्र बिन्दु होती है । जीजाबाई जैसी माएँ ही देश को शिवाजी जैसे सपूत देती हैं ।

जैसे बच्चा एक अमूल्य निधि होता है वैसे ही माँ बच्चे के लिए प्यार की , सुख की वो छाँव होती है जिसके तले बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है । सारे जहान के दुःख तकलीफ एक पल में काफूर हो जाते हैं जैसे ही बच्चा माँ की गोद में सिर रखता है ।माँ भगवान का बनाया वो तोहफा है जिसे बनाकर वो ख़ुद उस ममत्व को पाने के लिए स्वयं बच्चा बनकर पृथ्वी पर अवतरित होता है ।

एक बच्चे के लिए माँ और उसकी ममता का उसके जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । मगर हर बच्चे को माँ या उसकी ममता नसीब नही हो पाती । कुछ बच्चे जिनके सिर से माँ का साया बचपन से ही उठ जाता है वो माँ की ममता के लिए ज़िन्दगी भर तरसते रहते हैं । या कभी कभी ऐसा होता है कि कुछ बच्चों के माँ बाप होते हुए भी वो उनसे अलग रहने को मजबूर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं । ऐसे में उन बच्चों के वि़कास पर इसका बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है । कुछ बच्चे माँ की माता न मिलने पर बचपन से ही कुंठाग्रस्त हो जाते हैं तो कुछ आत्मकेंद्रित या फिर कुछ अपना आक्रोश किसी न किसी रूप में दूसरों पर उतारते रहते हैं । बचपन वो नींव होता है जिस पर ज़िन्दगी की ईमारत बनती है और यदि नींव डालने के समय ही प्यार की , सुरक्षा की , अपनत्व की कमी रह जाए तो वो ज़िन्दगी भर किसी भी तरह नही भर पाती ।

कोशिश करनी चाहिए की हर बच्चे को माँ का वो सुरक्षित , ममत्व भरा आँचल मिले जिसकी छाँव में उसका बचपन किलकारियां मारता हुआ ,किसी साज़ पर छिडी तरंग की मानिन्द संगीतमय रस बरसाता हुआ आगे बढ़ता जाए, जहाँ उसका सर्वांगीन विकास हो और देश को , समाज को और आने वाली पीढियों को एक सफल व सुदृढ़ व्यक्तित्व मिले ।



जिस मासूम को मिला न कभी
ममता का सागर
फिर कैसे भरेगी उसके
जीवन की गागर
सागर की इक बूँद से
जीवन बन जाता मधुबन
ममता की उस छाँव से
बचपन बन जाता जैसे उपवन
बचपन की बगिया का
हर फूल खिलाना होगा
ममता के आँचल में
उसे छुपाना होगा
ममत्व का अमृत रस
बरसाना होगा
हर बचपन को उसमें
नहलाना होगा

माँ के आँचल सी छाँव
गर मिल जाए हर किसी को
तो फिर कोई कंस न
कोशिश करे मारने की
किसी भी कृष्ण को
अब तो हर कंस को
मरना होगा और
यशोदा सा आँचल
हर कृष्ण का
पलना होगा
आओ एक ऐसी
कोशिश करें हम

मंगलवार, 12 मई 2009

और तुम आज आई हो ...............

दोस्तों ,

आज मैं अपनी १५० वी पोस्ट डाल रही हूँ .आशा करती हूँ हमेशा की तरह इसे भी आपका प्यार मिलेगा।



सिर्फ़ एक चाह थी
जी भर कर तुम्हें देख पाता
दिल की बातें तुमसे कह पाता
कुछ तुम्हारी सुन पाता
कुछ अपनी कह पाता
उम्र गुजार दी हैं मैंने
तुम्हारे इसी इंतज़ार में
सिर्फ़ एक बार मिलन की आस में
तुमसे पहली बार मिलने की चाह में
तुम्हें निगाहों में भर लेने की आस में
अपने वजूद को तुममें ढूंढ पाता
हर पल के इंतज़ार का हिसाब
तुम्हें दिखा पाता
लहू की हर बूँद में लिखा
तुम्हारा नाम , तुम्हें दिखा पाता
सोचो ज़रा , कितना इंतज़ार किया होगा
इक उम्र गुजार दी मैंने
तेरे पिछले जनम के वादे पर
कि , अगले जनम मिलेंगे हम
और तुम आज आई हो .......
और मैं तुम्हें देख भी नही सकता
जब आंखों की रौशनी बुझ चुकी है
हाल - ऐ - दिल बयां भी नही कर सकता
शब्द हलक में अटक गए हैं
अर्थी भी सज चुकी है
बस , आखिरी साँस का इंतज़ार है
और तुम आज आई हो .........
मेरी रूह को सुकून पहुँचाने के लिए
या फिर से तडफाने के लिए
एक और जनम के इंतज़ार में
फिर दर-दर भटकाने के लिए
और तुम आज आई हो ..............

शुक्रवार, 8 मई 2009

अनकहे ख्याल

कुछ ख्याल
आते आते
भटक जाते हैं
अपने ही दायरों में
सिमट जाते हैं
भावों को न
पकड़ पाते हैं
शून्य में ही कहीं
खो जाते हैं
कुछ कहते- कहते
ना जाने
क्या कह जाते हैं
ख्याल पर ख्याल
पलट जाते हैं
भावों के मंथन
की कौन कहे
यहाँ तो लब तक
आते- आते
अल्फाज़ बदल जाते हैं
एक भाव में
दूसरा भाव
उलझ जाता है
शब्दों में ना
बंध पाता है
भावों में बहते-बहते
शब्द भी खो जाते हैं
और फिर
कुछ ख्याल
अनकहे ही
रह जाते हैं

मंगलवार, 5 मई 2009

पैसा ये सिर्फ़ पैसा है

कैसे कैसे रंग दिखाता है
क्या क्या नाच नाचता है
पैसा ये सिर्फ़ पैसा है
किसी का नही होता है
फिर भी
जिसके पीछे पड़ जाता है
उसका सुख चैन उडाता है
पल पल रंग बदलता है
रिश्तों को भी परखता है
किसी के साथ न जाता है
फिर भी हाथ न आता है
जिसके पास भी आता है
उसे आसमान में उडाता है
मगर ख़ुद न कभी बंध पाता है
बस अपना दास बनाता है
अपने रंग में रंग लेता है जब
तब अपने रंग दिखाता है
साँस साँस का मालिक बनकर
बुद्धि को भरमाता है
बुद्धि को जब फेर देता है
होशो-हवास भी छीन लेता है
दुनिया की तो बात ही क्या
दीन धर्म भी छीन लेता है
ज्ञानी जन भी नतमस्तक हो
इसको शीश झुकाते हैं
इसके अद्भुत रंगों से
कोई न बच पाता है
कहीं कम तो कहीं ज्यादा
अपने रंग दिखाता है
धरती का भगवान बनकर
अपनी पूजा करवाता है
पैसा ये सिर्फ़ पैसा है
धर्म, जाति , भाषा से उपर
इसका वैभव दीखता है
बिन पैसे तो भइया
जीवन सूना लगता है
अपने मोहजाल में फंसाकर
अपनों से दूर करता है
इसकी पराकाष्ठा तो देखो
इसके मद में चूर प्राणी
मर्यादा का भी हनन करता है
पैसा ये सिर्फ़ पैसा है
किसी का जो न कभी होता है

शनिवार, 2 मई 2009

तू मानव तो बनना सीख ले

सीता मुझमें ढूँढने वाले
पहले राम तो बनना सीख ले
राम भी बनने से पहले
तू मानव बनना सीख ले
हर सीता को राम मिले
ऐसा यहाँ कब होता है
राम के वेश में ना जाने
कितने रावण हैं विचर रहे
इस दुनिया रुपी वन में
आजाद ना कोई सीता है
कदम कदम पर यहाँ
भयभीत हर इक सीता है
रात के बढ़ते सायों में
महफूज नही कोई सीता है
सीता को ढूँढने वाले मानव
तू नर तो बनना सीख ले
सीता के भक्षक रावणों से
पहले सीता को बचाना सीख ले
पग-पग पर अग्निपरीक्षा लेने वाले
पहले तू मानव तो बनना सीख ले
तू मानव बनना सीख ले ................

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

वो तुम ही तो हो

प्रेम सुधा बरसाने वाली
मन को मेरे हरषाने वाली
ख्वाबों में झलक दिखाने वाली
प्राणप्रिया बन जाने वाली
जीवनाधार बन जाने वाली
रूह में बस जाने वाली
बदली सी छा जाने वाली
मेघों सी बरस जाने वाली
खुशबू से जीवन महकाने वाली
मुझे मुझसे चुराने वाली
जीवन की प्यास बुझाने वाली
होठों पर गीत बन ढल जाने वाली
जीवन को महकाने वाली
प्रिये ,
वो तुम ही तो हो
चित्त को मेरे चुराने वाली
मेरी जीवनसंगिनी बन जाने वाली
वो तुम ही तो हो

रविवार, 26 अप्रैल 2009

दास्ताँ

इक दास्ताँ तू कह
इक दास्ताँ मैं कहूँ
फ़साना ख़ुद बन जाएगा
गर ना बना तो
ज़माना बना देगा
तेरी मेरी चाहत को
एक नया नाम दे देगा

इक कहानी तू बन जा
इक कहानी मैं बन जाऊँ
तारीख गवाही दे देगी
तेरी मेरी कहानी को
इक नया आयाम दे देगी

इक सवाल तू बन जा
इक सवाल मैं बन जाऊँ
हल तो मिल ही जाएगा
गर ना मिला तो
तेरे मेरे सवालों को
दुनिया मुकाम दे देगी

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

हर इंसान में है साहित्यकार छुपा

ये आसमान में उड़ने वाले
उन्मुक्त पंछी हैं
मत रोको इनकी उडान को
मत बांधो इनके पंखों को
बढ़ने दो इनकी परवाज़ को
फिर देखो इनकी उड़ान को
क्यूँ बांधते हो इन्हें
साहित्य के दायरों में
साहित्य तो ख़ुद बन जाएगा
एक बार उडान तो भरने दो
मत ललकारो प्रतिभावानों को
प्रतिभा स्वयं छलकती है
किसी भी साहित्य के दायरे में
प्रतिभा भला कब बंधती है
साहित्य भी कब बंधा है किसी दायरे में
हर इंसान में है साहित्य छुपा
जिसने भी रचना को रचा
वो ही है साहित्यकार बना
साहित्य ने कब बांधा किसी को
वो तो स्वयं शब्दों में बंधता है
शब्दों के गठजोड़ से ही तो
साहित्यकार जनमता है
हर लिखने वाला इंसान भी
बाँध रहा संसार को
वो भी तो साहित्यकार है
एक घर है परिवार है
इसलिए
मत रोको इनकी उडान को

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

अमिट छाप

मन के कोरे कागज़ पर तुम
एक कविता लिख दो
अपने प्यार का
एक दिया जला दो
मन को इक
दर्पण सा बना दो
जब भी झांको
अपनी ही छवि निहारो
ओ मेरे प्रियतम
मेरे मन को तुम
अपना मन बना लो
सोचूँ मैं, और
तुम उसे बता दो
मैं , मैं न रहूँ
तेरा ही प्रतिबिम्ब
बन जाऊँ
मन के कोरे कागज़ पर तुम
अपनी अमिट छाप लगा दो

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

दुनियादारी हर काम के बीच क्यूँ आ जाती है

दुनियादारी हर काम के बीच क्यूँ आ जाती है
कभी समाज के साथ
तो कभी हकीकत के साथ
कभी प्यार के साथ
तो कभी रुसवाई के साथ
दुनियादारी अपना रंग
दिखा ही जाती है
और हम दुनियादारी के
भंवर में फंसे
कभी ख़ुद को भुलाते हैं
कभी अपने प्यार को
कभी वादों को भुलाते हैं
तो कभी इरादों को
इस दुनियादारी के
अजीबो-गरीब रंगों में
कभी ख्वाबों को बुनते हैं
तो कभी उन्हें टूटते देखते हैं
कभी परम्पराओं के नाम पर
तो कभी रुढियों के नाम पर
कभी रिवाजों के नाम पर
तो कभी खोखले उसूलों के नाम पर
दुनियादारी हर बार
हर काम के बीच
इक दीवार बन ही जाती है
और हम न चाहते हुए भी
दुनियादारी निभाने को
मजबूर हो जाते हैं

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

क्षणिकाएं

मेरे इश्क की इम्तिहान तो देख
कितना टूटकर चाहा तुझे
कि तिनका तिनका बिखर गई


न कोई गिला है न कोई शिकवा है
बस तेरे आँगन की तुलसी बनने का इरादा है

तेरे आँगन में बसती है रूह हमारी
बस तेरे दिल में जगह पाने का इरादा है

तू जगह दिल में दे न दे शिकायत नही
बस हर शाम तेरे दीदार का इरादा है

तेरे आँगन में ही कब्र खुदी है हमारी
बस उसी में दफ़न होने का इरादा है







तेरी मोहब्बत को आवाज़ दूँ
आज तुझे तुझसे चुरा लूँ
तू मोहब्बत का बादल बन
मेरी कोरी चूनर को भिगो दे
मैं तेरी चकोरी बन
तुझे नैनों में छुपा लूँ

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

बस तू एक बार फिर से मुस्कुरा दे

सुनो
आज पहली बार मैंने
तुम्हें ज़िन्दगी से इतना
मायूस देखा
तुम्हारे दर्द के दर्द को
कहीं बहुत गहरे
महसूस किया
कितना टूट गए हो
कितना खामोश हो गए हो
तुम तो ऐसे न थे
ज़िन्दगी से भरपूर
हर वक्त चहकते
और चहकाते
कितने अच्छे लगते थे
तुम्हारा यूँ टूटना
उदासी के गहरे सागर में डूबना
कल की चिंता में
आज को बरबाद करना
दिल को बहुत
गहरे चुभ गया है
ज़िन्दगी से इतने गिले न करो
प्यार के दो पलों को
जीवन में संजो लो
ज़िन्दगी सिर्फ़ खामोशी नही
जिंदगी सिर्फ़ ख्वाब नही
ज़िन्दगी इक खुमार भी है
जिन्दी इक प्यार भी है
ज़िन्दगी ठंडी फुहार भी है
ज़िन्दगी खुशियों की सौगात भी है
कुछ गम अपने
बाँट लो मुझसे
कुछ दर्द अपना दे दो मुझे
देखना ज़िन्दगी का
हर लम्हा बदल जाएगा
तेरे दिल को भी
कुछ तो सुकून
मिल जाएगा
इतना तो अपनी
दोस्ती का हक़
दे दो मुझे
कुछ अपने दर्द को
जी लेने दो मुझे
बस तू एक बार मुस्कुरा दे
फिर से यूँ ही
चहकने लगे
और गुलिस्तां तेरा
महकने लगे
बस तू एक बार फिर से
मुस्कुरा दे

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

उसी का नाम दुनिया है

जो एक कली को फूल बना दे
और उसे ज़िन्दगी भर काँटों पर सुला दे
और चोट लगने पर आह भी करने न दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरे दुःख पर खुशियाँ मनाये
और सुख में बाधाएं डाले
उसी का नाम दुनिया है

जो तुझे बेईमानी,धोखेबाजी
चालबाजी,भ्रष्टाचार सिखा दे
तेरी मासूमियत को
इनके नीचे दबा दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरे होठों की हँसी को छीन ले
और आंखों में आंसू भर दे
उसी का नाम दुनिया है

जो जीतने का हर गुर सिखा दे
तुझे तेरे अपनों से जुदा करा दे
और गैरों को अपना बना दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरे अस्तित्व को मिटा दे
तेरे हर सच को झूठ बना दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरी खुशी को देख जल जाए
और गम में तेरे आंसू न बहाए
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरी मासूमियत को मिटा दे
तुझे इंसान से पत्थर बना दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरी हर चाहत को मिटटी में मिला दे
तेरे हर अरमान को कफ़न उढा दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तेरी हर साँस पर पहरे लगा दे
तेरी हर आह पर खुशी के दीप जलाये
उसी का नाम दुनिया है

जो अपने सुख के लिए
इंसान को भगवान बना दे
और अपने मतलब के लिए
भगवान को भी पत्थर बता दे
उसी का नाम दुनिया है

जो तुझे अपना बनाकर
ठोकरों पर इतनी ठोकरें मारे
कि तुझे भगवान से मिला दे
उसी का नाम दुनिया है

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

कैसे ?

कैसे आऊं
ख्यालों में तुम्हारे
ज़माना देख न ले
कैसे रहूँ
दिल में तुम्हारे
दिल सबसे कह न दे
कैसे जियूं
संग तुम्हारे
ज़िन्दगी धोखा न दे दे
कैसे चलूँ
साथ तुम्हारे
राहें बदल न जायें
कैसे कहूँ
दिल की बातें
जहान सुन न ले

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मुसाफिर और स्टेशन

जिंदगियों की पटरियों पर
चलते चलते
न जाने कितने
स्टेशन आए
मगर ये न रुकी कहीं
हर स्टेशन पर
मुसाफिर बदले मगर
ये न बदली कभी
मुसाफिरों का साथ
बनता रहा,छूटता रहा
मगर न पता था
किसी एक स्टेशन पर
कहीं कोई मुसाफिर
किसी के इंतज़ार में
उम्र गुजार रहा था
जब मिले उस स्टेशन पर
यूँ लगा , वक्त थम गया
रूह का रूह से
अनोखा मिलन था
खामोश निगाहों से
बिना कुछ कहे
बातें हो गयीं
एक कसक दिल में लिए
मुसाफिर मिला
न जाने कितने जन्मों का प्यासा था
न जाने किस रूह को खोज रहा था
अपने हर जज़्बात को
वक्त की तराजू में
तोल रहा था
मगर वक्त कब ठहरा है
और ज़िन्दगी कब रुकी है
एक बार फिर
ज़िन्दगी दौड़ने लगी
पटरियों पर
मुसाफिर को
वहीँ छोड़कर
किसी खास याद के सहारे
फिर किसी और
स्टेशन पर
फिर किसी जनम में
मुलाक़ात का वादा करके
ज़िन्दगी ने मुसाफिर से
रुखसती ली
और ज़िन्दगी फिर से
अपनी अनजान
दिशा की ओर
स्टेशन पर स्टेशन
दौड़ते हुए
मुसाफिरों को
छोड़ते हुए
पटरियों पर दौड़ती रही

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

खुली किताब के अक्षर

खुली किताब के भी,अक्षर तो काले होते हैं
अक्षरों का कालापन ही ,ज़िन्दगी की गवाही देता है
हर काले अक्षर में
इक ख्वाब अधूरा दीखता है
कभी किसी अक्षर में
दिल से दिल मिलता है
किसी काले अक्षर में तो
तूफ़ान गुजरता दीखता है
हर अक्षर में किताब की
इक नई कहानी मिलती है
कभी अनकही,
कभी अधूरी,
कभी खामोश,
कभी मदहोश
इक रवानी छुपी दिखती है
कभी किसी अक्षर से
बेवफाई झलकती है
और किसी अक्षर से तो
तन्हाई ही टपकती है
इन अक्षरों में
दिल के कई राज़ छुपे मिलते हैं
ज़िन्दगी के हर पन्ने का
इक सच दिखाते फिरते हैं
अक्षर चाहे काले हों
आइना बन झलकते हैं
खुली किताब के भी
अक्षर तो काले होते हैं

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

दिल चाहता है

दिल चाहता है
शबनम का इक कतरा बन
तेरे अधरों पर सज जाऊं
तू मुझको ऐसे पी जाए
जन्मों की प्यास फिर बुझ जाए
दिल चाहता है
बादलों का काजल बन
तेरे नैनों में बस जाऊँ
तू मुझको ऐसे छुपा ले
दुनिया को भी न नज़र आऊं
दिल चाहता है
सीप का मोती बन
तेरे दिल में बस जाऊँ
मैं तुझमें ऐसे समां जाऊँ
फिर तुझको भी न नज़र आऊं

रविवार, 29 मार्च 2009

काश !

काश ! दिल न होता
तो यहाँ दर्द न होता

काश ! आँखें न होती
तो इनमें आंसू न होते

काश ! ज़िन्दगी न होती
तो यहाँ कोई मौत न होती

काश ! दिन न होता
तो यहाँ कभी रात न होती

काश ! बसंत न होता
तो यहाँ कभी पतझड़ न होता

काश ! प्यार न होता
तो यहाँ कभी जुदाई न होती

काश ! हम न होते
तो यहाँ कुछ भी न होता

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

मधुरिम पल

कुसुम कुसुम से ,कुसुमित सुमन से
तेरे मेरे मधुरिम पल से
अधरों की भाषा बोल रहे हैं
दिलों के बंधन खोल रहे हैं
लम्हों को अब हम जोड़ रहे हैं
भावों को अब हम तोल रहे हैं
नयन बाण से घायल होकर
दिलों की भाषा बोल रहे हैं
हृदयाकाश पर छा रहे हैं
मेघों से घुमड़ घुमड़ कर
तन मन को भिगो रहे हैं
पल पल सुमन से महक रहे हैं
मधुरम मधुरम ,कुसुमित कुसुमित
दिवास्वप्न से चहक रहे हैं
तेरे मेरे अगणित पल
तेरे मेरे अगणित पल

बुधवार, 25 मार्च 2009

मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नही

मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नही
क्यूँ मुझे कमतर समझा जाता है
क्या मुझमें वो जज़्बात नही
क्या मुझमें वो दर्द नही
जो बच्चे के कांटा चुभने पर
किसी माँ को होता है
क्या मेरा वो अंश नही
जिसके लिए मैं जीता हूँ
मुझे भी दर्द होता है
जब मेरा बच्चा रोता है
उसकी हर आह पर
मेरा भी सीना चाक होता है
मगर मैं दर्शाता नही
तो क्या मुझमें दिल नही
कोई तो पूछो मेरा दर्द
जब बेटी को विदा करता हूँ
जिसकी हर खुशी के लिए
पल पल जीता और मरता हूँ
उसकी विदाई पर
आंसुओं को आंखों में ही
जज्ब करता हूँ
माँ तो रोकर हल्का हो जाती है
मगर मेरे दर्द से बेखबर दुनिया
मुझको न जान पाती है
कितना अकेला होता हूँ तब
जब बिटिया की याद आती है
मेरा निस्वार्थ प्रेम
क्यूँ दुनिया समझ न पाती है
मेरे जज़्बात तो वो ही हैं
जो माँ के होते हैं
बेटा हो या बेटी
हैं तो मेरे ही जिगर के टुकड़े वो
फिर क्यूँ मेरे दिल के टुकडों को
ये बात समझ न आती है
मैं ज़िन्दगी भर
जिनके होठों की हँसी के लिए
अपनी हँसी को दफनाता हूँ
फिर क्यूँ उन्हें मैं
माँ सा नज़र ना आता हूँ




शुक्रवार, 20 मार्च 2009

सोच ज़रा

सोच ज़रा
कितना दिल
दुख होगा
जब तेरी
खामोशी ने
उसको डंसा होगा
कुछ पल तो
साथ बिता लेते
उसके दिल का
हाल जान लेते
उसके ज़हर को
अमृत बना देते
उसे उसके दर्द से
निजात दिला देते
तो कुछ ही पलों में
दर्द के सागर में
ज़ज्बातों के
तूफ़ान की कश्ती
ठहर जाती
वो अपने दरिया में
सिमट जाती
तेरे साथ होने के
अहसास से ही
वो हर ज़हर को भी
अमृत समझ पी जाती
सोच ज़रा
कितना दिल दुख होगा

सोमवार, 16 मार्च 2009

दोहरी ज़िन्दगी

दोहरी ज़िन्दगी जीते हम लोग
हर पल चेहरे बदलते हैं
अपने लिए एक चेहरा
और दुनिया के लिए
दूसरा रखते हैं
अपने मापदंड अलग रखते हैं
अपने ख्वाबों के लिए
अपनी हर चाहत के लिए
हर हथकंडा अपनाते हैं
मगर जब वो ही ख्वाब
कोई दूसरा देखे तो
मापदंड बदल जाते हैं
फिर भी दुनिया
ना जान पाती हैं
चेहरे के पीछे छिपे चेहरे को
ना पहचान पाती हैं
हम अपने लिए जो चाहते हैं
क्यूँ दुनिया को ना दे पाते हैं
दूसरे का ख्वाब आते ही
क्यूँ हमारे अर्थ बदल जाते हैं
कब तक हम चेहरे बदल पाएंगे
दोहरी ज़िन्दगी की आग में
इक दिन ख़ुद ही जल जायेंगे
उस दिन ना हम
दुनिया के रह पाएंगे
और ना ही अपने आप के
फिर किस भुलावे में
जिए जाते हैं
दोहरी ज़िन्दगी की आग से
क्यूँ ना निकल पाते हैं
दोहराव कब टिका हैं
एक दिन तो आख़िर
मिटा ही हैं
हम भी कब तक
टिक पाएंगे
इक दिन इस दोजख से
शायद निकल पाएंगे

शनिवार, 14 मार्च 2009

कशमकश

कुछ कहने और न कहने के बीच झूलते हम
कभी हकीकत बयां नही कर पाते
कुछ लम्हों को जी नही पाते
कुछ लम्हों को जीना नही चाहते
कभी खामोश रहकर सब कह जाते हैं
कभी बोलकर भी कुछ कह नही पाते
न जाने कैसी विडम्बना में जीते हैं
न ख़ुद को जान पाते हैं
न दूसरों को जानने देते हैं
कभी किसी अनचाही दौड़ में
शामिल हो जाते हैं तो
कभी चाहकर भी कहीं
पहुँच नही पाते
न जाने किस चाह में जीते हैं
न जाने किस मय को पीते हैं
मगर फिर भी खाली ही रहते हैं
कभी कुछ पा नही पाते
किसी को कुछ दे नही पाते
न जाने किस भूख ने सताया है
न जाने किसकी तलाश में निकले हैं
न खो पाते हैं
न खोज पाते हैं
बस सिर्फ़
रो पाते हैं
और
उलझनों में ज़िन्दगी
गुजार जाते हैं
ना हंस पाते हैं
ना हंसा पाते हैं
सिर्फ़ भावनाओं में
बह जाते हैं या
कभी किसी को
बहा ले जाते हैं
मगर कभी
पार नही पाते हैं
सिर्फ़ कशमकश में
जीते हैं और मरते हैं
सिर्फ़ कशमकश में...........................

गुरुवार, 12 मार्च 2009

आवारा बादल

आज एक आवारा बादल
मेरी खिड़की में झाँका
कुछ बहकता सा
कुछ चहकता सा
दिल को कुछ यूँ
गुदगुदाने लगा
मैंने पूछा ,
क्यूँ आए हो
किसका तन मन
भिगोने आए हो
किसकी प्यासी रूह की
प्यास बुझाने आए हो
मगर वो तो सिर्फ़
इठलाता रहा
बलखाता रहा
मदमस्त सा,
अपने ही खुमार में
इधर से उधर
बरसता रहा
कभी ठंडी फुहार बनकर
तो कभी महकता
प्यार बन कर
कभी भंवरों सा
इठलाता था
कभी संगीत के सुरों सा
नाचता था
न जाने किस
मदहोशी में
डूबा था
किसके खुमार में
गुम था
उसे तो अपना भी
पता न था
फिर कैसे मुझे बतलाता
क्यूँ आया है
किसके दिल की
बगिया में
फूल खिलने आया है
किस फूल का
ये भंवरा है
किस गीत का
ये मुखडा है
किस साज़ की
ये आवाज़ है
किसके दिल का
प्यार है
किसके लिए
भटक रहा है
किस चाहत में
सिसक रहा है
किस कसक में
मचल रहा है
और
किसके लिए
बरस रहा है
यूँ आवारा
दर-दर
भटक रहा है
आज एक आवारा बादल
मेरी खिड़की में झाँका

रविवार, 8 मार्च 2009

आज फिर कहीं कोई मर गया है
आज फिर किसी की अर्थी उठी है
आज फिर किसी की चिता जली है
आज फिर कोई शख्स रुसवा हुआ है
तमाम तोहमतों के साथ
जिंदा होकर भी मर गया है

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

तड़प