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बुधवार, 28 सितंबर 2016

दुनिया कभी खाली नहीं होती .........

सोचती हूँ
सहेज दूँ ज़िन्दगी की बची अलमारी में
पूरी ज़िन्दगी का बही खाता
बता दूँ
कहाँ क्या रखा है
किस खाने में कौन सा कीमती सामान है

मेरे अन्दर के पर्स में कुछ रूपये हैं
जो खर्च करने के लिए नहीं हैं
लिफाफों में हैं
निकालती हूँ हमेशा सबके जन्मदिन पर एकमुश्त राशि
करुँगी प्रयोग किसी जरूरतमंद के लिए

ऐसे ही कुछ रूपये
तुम सबकी सैलरी के हैं हरी डिब्बी में
वो भी इसीलिए निकाले हैं
जो किये जा सकें प्रयोग
किसी अनाथाश्रम में या वृद्ध आश्रम में

बाकी तो बता दूँगी तुम्हे लॉकर का नंबर भी
पता है मुझे
नहीं याद होगा तुम्हें
निश्चिन्त रहे हो मुझ पर सब छोड़कर
सुनो
मोह नहीं मुझे उसका भी
जैसे चाहे प्रयोग करना
बच्चों को पसंद आये तो उन्हें देना
न आये तो नए बनवा देना
जब शरीर ही नहीं बचेगा
तो ये तो धातु है , इससे कैसा प्रेम ?

बाकी और कौन सी चाबी कहाँ रखी है
जानते हो तुम
कभी तुम से या बच्चों से कुछ छुपाया जो नहीं
इसलिए बताने को भी ज्यादा कुछ है भी नहीं
तुम सोच रहे होंगे
तुमसे कुछ नहीं कहा
एक उम्र के बाद कहने को कुछ नहीं बचता
दोनों या तो एक दूसरे को इतना समझने लगते हैं
या फिर .....?

फिर भी मेरी यादों के तिलिस्म में मत उलझना
वैसे भी सफ़र कहीं न कहीं ठहरता ही है
उम्र का ढलान गवाह है
और मैंने ऐसा कुछ किया ही नहीं
जिसके लिए याद रखा जाए
विवाह की वेदी पर
साथ रहने को मजबूर कर दिए गए अस्तित्वों में
असंख्य छेदों के सिवा और बचता ही क्या है ?
चलो छोडो ये सब
विदाई की बेला में बस इसे मेरी इल्तिजा समझना
बच्चों पर अपनी इच्छाएं मत थोपना
उन्हें उड़ान भरने देना
कभी जबरदस्ती मत करना
बस कर सको तो इतना कर देना

और हाँ बिटिया
अब जिम्मेदारी तुझ पर होगी
लेकिन
तुम्हीं एक बात समझनी होगी
खुद की ज़िन्दगी से न कोई समझौता करना
वर अपने मन का ही पसंद करना
दबाव और डर से न ग्रस्त होना
मैं नहीं होऊँगी तुम्हारे साथ
तुम्हारे लिए लड़ने को
अपनी लड़ाई तुम्हें खुद लड़नी होगी
अपनी पहचान खुद बनानी होगी
यहाँ आसानी से कुछ नहीं मिलता
जानती हूँ
गिव अप की तुम्हारी आदत को
तुम्हारे बदलने से ही दुनिया बदलेगी 

न को न और हाँ को हाँ समझाना
अब तुम्हारा काम है बच्ची
बेटा
तू भी एक मर्द है
लेकिन
तू नामर्द न बनना
इंसानियत की मिसाल बनना
स्त्री का न अपमान करना
वो भी इंसान है तुम सी ही
बस इतनी सी बात याद रखना
उसके अस्तित्व पर न प्रश्नचिन्ह रखना
जिस दिन जीवन में उतार लोगे
अपनी सोच से दुनिया को बदल दोगे

बाकी
हवा , मिटटी , पानी का क़र्ज़ तो
साँस देकर भी न चुका पाऊँगी
चाहे मिटटी में दबाना या अग्निस्नान कराना
या पानी में बहाना
देखना मिलूंगी मिटटी में ही मिटटी बनकर
फिर खिलूंगी इक फूल बनकर
और बिखर जाऊँगी फिजाओं में खुशबू बनकर
बस हो जाउंगी कर्जमुक्त

बाकी
जो यहाँ से पाया यही छोड़ कर जाना है
अटल सत्य है ये
इसलिए
मेरे सामान में अब मेरी किताबें हैं
जो शायद तुम में से किसी के काम की नहीं
मेरा लेखन है
जिससे तुम सभी उदासीन रहे
तो मत करना परवाह मेरी अनुभूतियों की
कोई मांगे दे देना
खाली हाथ आये खाली जाना है
तो फिर किसलिए दरबार लगाना है
रहना कुछ नहीं
फिर किसलिए इतनी लाग लपेट 

मुक्त हो जाना चाहती हूँ हर बंधन से
और ये भी एक बंधन ही तो है


ये मेरी न वसीयत है न अंतिम इच्छा
जानती हूँ
जाने के बाद कोई वापस नहीं आता
जानती हूँ
कुछ समय रोने के बाद कोई याद नहीं रखता
आगे बढ़ना प्रकृति का नियम है
फिर भी
अंतिम फ़र्ज़ निभाने जरूरी होते हैं
कल याद कभी आऊँ तो
गिले शिकवे से न आऊँ
यही सोच
कह दी मन की बात
वर्ना
मुझसे तो रोज जन्मते और मरते हैं
दुनिया कभी खाली नहीं होती .........

बुधवार, 21 सितंबर 2016

ये कैसा हाहाकार है

ये कैसा हाहाकार है

कुत्ते सियार डोल रहे हैं
गिद्ध माँस नोंच रहे हैं
काली भयावह अंधियारी में
मचती चीख पुकार है
ये कैसा हाहाकार है

चील कौवों की मौज हुई है
तोता मैना सहम गए हैं
बेरहमी का छाया गर्दो गुबार है
ये कैसा हाहाकार है

काल क्षत विक्षत हुआ है
धरती माँ भी सहम गयी है
उसके लालों पर आया 
संकट अपार है
ये कैसा हाहाकार है

अत्याचार का सूर्य उगा है
देख , दिनकर का भी शीश झुका है
दहशतगर्दों ने किया अत्याचार है
ये कैसा हाहाकार है

शेर चीते सो रहे हैं
गीदड़ भभकी से क्यों डर रहे हैं
कैसी चली उल्टी बयार है
ये कैसा हाहाकार है 
 
धरती माँ के उर में उरी का दंश उगा है

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोहब्बत का पीलापन

मेरी मोहब्बत के अश्क
जज़्ब ही हुए
बहने को जरूरी था
तेरी यादों का कारवाँ

लम्हे ख़ामोशी से समझौता किये बैठे हैं
इंतज़ार की कोई धुन होती तो बजाती

इतनी खाली इतनी उदास मोहब्बत
ये मोहब्बत का पीलापन नहीं तो क्या है ?

और ये है मोहब्बत का इनाम
कि
अब तो आह भी नहीं निकलती

मेरी मोहब्बत के रुसवा होने का अंदाज़ ज़माने से कुछ जुदा ही रहा 
फिर उस इश्क का इकतारा कैसे बजाऊँ
जिसके सब तार टूट चुके हों 
 
आमीन कहने को जरूरी है कोई इक दुआ .........
 


मंगलवार, 9 अगस्त 2016

'अति सर्वत्र वर्जयेत'

मैं कविता का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष
मैं कवयित्री का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष
और खिंच गयी तलवारें दोनों ही ओर से

गहन वेदना में थी उस वक्त
जिंदा थी या मर चुकी थी कविता
आकलन को नहीं था कोई संवेदनशील बैरोमीटर

कि
जरूरी था शोर
जरूरी था बस
अपराधी को अपराधी सिद्ध किया जाना 

या निरपराधी को अपराधी सिद्ध किया जाना
दोनों ही ओर से
निपट स्याह स्याही से लिखी जा रही थी इबारत
नाज़ करने को फिर चाहे
बचे ही न सियासत 


रियाया मजबूर है
फटे कपड़ों से तन ढांकने को
राजज्ञा की अवमानना
आज के वक्त का सबसे बड़ा गुनाह जो है
उस पर सिपहसालार और मंत्रिपरिषद जानते हैं
कैसे चुने जाते हैं अर्थी से फूल
फिर क्यूँ पचड़े में पड़ते हो 

ये मूढ़मगज समय है 
जिसमे उधर ही झुक जाते हैं पलड़े 
जिधर भार ज्यादा होता है 
मगर इस बार संतुलन का काँटा 
ख्याति का मध्य भाग बना 
फैला रहा है अराजकता 

पुरस्कारों की क्रांति से 
बिफरा तबका 
अपने अपने कसबे का बनकर 
बेताज बादशाह 
कर रहा है हलाल 
कविता की घिंघियाती आवाज़ से नहीं होता स्वप्नदोष 
बस जरूरी है स्खलन 



तो क्या हुआ
जो हो कविता के नाम पर
तो कभी साहित्य के नाम पर
भाषा का बलात्कार
रोना तो कविता को ही है
क्योंकि
कविता का जिस्म तार तार है
और शामिल है पूरा गिरोह जहाँ
वहां
हवन पूजा यज्ञ आदि से नहीं हुआ करती शांति

कि
ये कविता का उत्तर पक्ष नहीं
सूर्यदेव दक्षिणायन को गए हुए हैं 
'अति सर्वत्र वर्जयेत' महज चेतावनी का हास्यास्पद रूप है आज ...

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

साहेब ने कहा

साहेब ने कहा
लडकियाँ आधी रात को भी अकेली बेधड़क कहीं भी जा सकेंगी . एक बार देश की डोर मेरे हाथ देकर तो देखो .मेरे गुजरात में रात को दो बजे भी लड़की स्कूटी पर अकेली कहीं भी जा सकती है .
कर लिया विश्वास , दे दी डोर . मगर क्या मिला ?
एक बार फिर जनता धोखा खा गयी . अब दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश या कोई भी अन्य प्रदेश स्त्रियाँ , लडकियाँ कल भी गैंग रेप की शिकार हो रही थीं और आज भी बल्कि दुगुनी तादाद से .
आप तो सारे देश के प्रधानमंत्री हैं . आपसे ही उम्मीद थी आप स्त्रियों के लिए कुछ करेंगे लेकिन क्या हो रहा है साहेब . जरा यहाँ भी दृष्टि घुमाइए . सिर्फ प्रदेश में मत बांटिये देश को , स्त्रियों को . आप चाहें तो क्या नहीं हो सकता . कुछ देर राजनीति से ऊपर उठ जाइए इंसानियत के नाते ही सही .
आखिर कब तक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के नाम पर स्त्रियों के सम्मान और भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता रहेगा ?
क्या आप समझ सकते हैं किस पीड़ा से गुजरती होगी एक स्त्री ऐसी परिस्थिति में . जनाब आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते उसकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा का .
आपसे अनुरोध है बाहर से बेहतर एक बार घर की तरफ भी दृष्टि कीजिये . यहाँ की सुध भी लीजिये . यकीन मानिए जिस दिन आप हर घर और बाहर में स्त्री को सुरक्षित कर देंगे आधी आबादी तो वैसे ही आपके पक्ष में खड़ी हो जायेगी . आपको फिर अलग अलग प्रदेश के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ेंगे .
एक बार हिम्मत कीजिये . अविलम्ब न्याय का प्रावधान कीजिये . आज देश की हर स्त्री की निगाह आप पर टिकी है साहेब . न्याय में इतनी देर मत कीजिये कि वो अन्याय की श्रेणी में आ जाए .
क्योंकि जनता जानती है यदि आप चाहें तो सब कुछ संभव है . इस बार सुन लीजिये जरा स्त्रियों के मन की बात भी , अपने मन की तो आपने बहुत कह ली और उन्होंने बहुत सुन ली .
कहते हैं वही राजा और उसका राज्य सुरक्षित रहता है जहाँ की प्रजा सुखी हो . क्या स्त्रियाँ आपकी प्रजा नहीं ? क्या उनका मान सम्मान आपका मान सम्मान नहीं .........जरा सोचिये !

शनिवार, 30 जुलाई 2016

हंगामा है क्यों बरपा


जाने कितने सच इंसान अपने साथ ही ले जाता है . वो वक्त ही नहीं मिलता उसे या कहो हिम्मत ही नहीं होती उसकी सारे सच कहने की . यदि कह दे तो जाने कितना बड़ा तूफ़ान आ जाए फिर वो रिश्ते हों , राजनीति हो या फिर साहित्य ....

साहित्य के सच कहने वाले अक्सर अलग थलग पड़ जाते हैं , अछूत की सी श्रेणी में आ जाते हैं और क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो अकेला रहना नहीं चाहता इसलिए बन जाता है नीलकंठ और धारण कर लेता है अपने गले में गरल , जिसे उम्र भर न निगल पाता है और न ही उगल ....

ये है साहित्यजगत का सच , उसका असली चेहरा . शायद यही कारण है यहाँ अक्सर गुट बनते हैं , गुटबाजी होती है . खेमे बनते हैं , संघ बनते हैं . आखिर जिंदा रहने को साथ का टॉनिक जरूरी होता है . उससे और कुछ हो न हो अन्दर का मैं तो संतुष्ट हो ही जाता है . हाँ सराहा जा रहा हूँ मैं . हाँ पहचान बन गयी है मेरे लेखन की . तो क्या हुआ जो जुगाड़ का दांव खेला और अन्दर कर लिए दो चार पुरस्कार . जिंदा रहना जरूरी है . सांस लेना जरूरी है फिर उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े . आजकल कौन है जो  तलवे नहीं चाटता . तो क्या हुआ यदि हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया . उससे गंगा मैली थोड़े न हो गयी . बस जीने को कुछ साँसें मयस्सर हो गयीं . वैसे भी कहा गया है ... सांस है तो आस है .

ऐसे सच का क्या फायदा जो भ्रम में भी न जीने दे . जीने के लिए भ्रमों का होना जरूरी है .फिर गुजर जाती है ज़िन्दगी सुकून से बिना किसी जद्दोजहद के . वैसे भी नाम होना जरूरी है फिर सुमार्ग पर चलो या कुमार्ग पर . और साहित्य में कोई कुमार्ग होता ही नहीं . सभी सुमार्ग ही हैं आखिर हमारे पूर्वज बनाकर गए हैं तो कैसे संभव है वो कभी कुमार्ग पर चले हों और उनका अनुसरण करना ही हमारे देश की संस्कृति है .

जिस कार्य को करने से संतोष मिले , दिमाग शांत रहे और हर मनोकामना पूरी होती जा रही हो वो कैसे गलत हो सकता है भला . वो कहते हैं न काम वो ही करना चाहिए जिससे मानसिक शांति मिले . अब वो ही कर रहे हैं तो हंगामा है क्यों बरपा . चोरी तो नहीं की डाका तो नहीं डाला . अपना मार्ग ही तो चुना है . अब कौन सच से आँख मिला खुद को निष्कासित करे साहित्यजगत से . ये तो खुद अपना पैर कुल्हाड़ी पर रखना हुआ . हाँ नहीं तो ........

रविवार, 24 जुलाई 2016

'इन्द्रप्रस्थ' ... मेरी नज़र से



जाने माने कवि उपेन्द्र कुमार जी द्वारा मुझे बहुत ही सम्मान के साथ उनके द्वारा लिखा कविता संग्रह 'इन्द्रप्रस्थ' भेजा गया जो मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है जो उन्होंने मुझे इस काबिल समझा . उसे पढ़कर जो मेरे मन में प्रतिक्रिया उभरी वो आप सबके समक्ष हैं :

अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित कवि उपेन्द्र कुमार द्वारा लिखित कविता संग्रह ‘इन्द्रप्रस्थ’ अपने समय से संवाद कर रहा है . इन्द्रप्रस्थ सबसे पहले नाम ही मानो सम्पूर्ण खाका खींच रहा है अतीत से वर्तमान के मध्य सेतु बन . यहाँ इन्द्रप्रस्थ के जाने कितने अर्थ समेटे हैं कवि ने . माध्यम इन्द्रप्रस्थ है मगर सबके अपने ही इन्द्रप्रस्थ हैं . इन्द्रप्रस्थ कोई जमीन का टुकड़ा नहीं . इन्द्रप्रस्थ एक सुलगता हुआ सवाल है जिसमे हर पात्र अपने अपने नज़रिए से खुद को सही सिद्ध करने को जुटा है या कहिये एक ऐसा दृष्टिकोण जो अब तक ओझल रहा या फिर जिस पर कहने की सबकी सामर्थ्य नहीं सिर्फ ये सोच धार्मिक भावनाएं आहत हो जायेंगी या फिर हम कैसे इतिहास को तोड़ मरोड़ सकते हैं . अनेकानेक प्रश्न बेशक उठें लेकिन कहने के लिए हिम्मत का होना तो जरूरी है ही साथ ही उन भावनाओं का होना भी जो उस दृष्टिकोण से देखने की कोशिश कर सकें . स्त्री विमर्श मानो नींव है कविता संग्रह की लेकिन कहीं कोई शोर नहीं , सिर्फ प्रश्न उछाल देना और सोचने पर विवश कर देना यही है कवि के मन का इन्द्रप्रस्थ जहाँ वो स्वतंत्र है अपने दृष्टिकोण को व्यापकता देने को , स्त्री के सन्दर्भों को समझने को और फिर उनकी सूक्षमता को व्याख्यातित करने को .

अक्सर चुप्पी साध जाने वाला विषय है ये . यहाँ स्त्री यौनिकता आधार है सम्पूर्ण संग्रह का फिर माध्यम चाहे कोई भी पात्र क्यों न हो . युधिष्ठिर हो या अर्जुन या फिर कर्ण हो या कुंती कौन ऐसा था जिसका अपना स्वार्थ न था और द्रौपदी एक सुलगती चिता जिससे सब हाथ तो सेंक रहे हैं लेकिन उसकी पीड़ा को नज़रंदाज़ भी कर रहे हैं . सुलगना स्त्री की नियति है – प्रमाणित किया जा रहा है कदम – दर – कदम . कौन नहीं जानता महाभारत की कहानी . सभी जानते हैं फिर ऐसा क्या था जिसने कवि को लिखने को प्रेरित किया यही सोचने का विषय है . और जब संग्रह पढो तो पता चलता है यहाँ तो कवि का एक अलग ही इन्द्रप्रस्थ है जिसमे द्रौपदी को पाने की चाह में हर कोई अन्याय की पराकाष्ठा को पार करता ही चला गया और द्रौपदी वस्तु सी सबमे बंटती चली गयी , जानते हैं हम सभी . लेकिन उससे अलग क्या है ? उससे अलग है द्रौपदी की चाह जहाँ उसका प्रेम एक सम्पूर्णता पाता है जिसे कवि ने ‘मोर नाचते हैं’ के माध्यम से उकेरा है . ‘प्रेमी मिलन की राह खोज ही लेते हैं’ ... इस वाक्य को मानो कवि ने सिद्ध करना चाहा है तब जब एक एक वर्ष द्रौपदी के साथ रहने की भाइयों में ठहरती है . यहाँ द्रौपदी खोजती है अपने प्रेम को मुकाम देने का उपाय . एक भिन्न उपाय जो शायद अब से पहले किसी की दृष्टि में आया ही नहीं . रात्रि में ही तो शयनकक्ष में किसी भी भाई का आगमन वर्जित है लेकिन है तो वो सबकी पत्नी तो दिन में तो पाँचों उसके पति हैं और ऐसे में अर्जुन विशेष , क्योंकि वो ही तो है उसके प्रेम का मूलाधार . और प्रेम कब सही गलत देखता है . उसे तो अपने प्रियतम से क्षणिक जुदाई बर्दाश्त नहीं होती ऐसे में जरूरी है मिलन तो खोजा गया उपाय दिन में मिलने का . दिन में अपने सब मनोरथ पूर्ण करने का . यहाँ सब मनोरथ में सभी मनोरथ शामिल हैं फिर वो दैहिक हों या आत्मिक . एक स्त्री आखिर कैसे संभव है पांच पुरुषों से समान भाव से सम्भोग कर सके . जिसके प्रति प्रेम और निष्ठा होगी वहीँ प्रेम की सम्पूर्णता होती है और वहीँ प्रेम पूर्णता से आकार जब पाता है तभी एक स्त्री पूर्णतया संतुष्ट होती है . बेशक पांच में से चार के साथ सम्भोग करना उसकी मजबूरी ही सही लेकिन वहां न वो उद्दतता होती है और न ही उत्कंठा और न ही रोमांच . तो क्या वो सम्भोग हुआ ? क्या वो एक तरह से बलात्कार सरीखा न हुआ जहाँ न वो तन से शामिल है न मन से . और होता रहा एक स्त्री का शोषण और हम गा रहे हैं उसे उस समय का सुनहरा पक्ष समझ बिना जाने सन्दर्भों को और उनकी सूक्ष्मताओं को . बेशक द्रौपदी स्त्री थी लेकिन जानती थी कैसे पाना है अपना अभीष्ट . खोज लिया उसने रास्ता . यहाँ प्रश्न उठेगा कि कैसे संभव है अन्य भाइयों या कुंती को इस बारे में पता न हो . बेशक उन्हें पता होगा लेकिन गलती उन्होंने की थी . सब भाई चाहते थे द्रौपदी को पाना तभी ये जानते हुए भी कि वो स्वयंवर में गए हैं तो जो लायेंगे तो उस कन्या का वरण करके ही लायेंगे , कुंती सिर्फ अपने अभीष्ट को पाने हेतु उसे वस्तु स्वरुप पाँचों भाइयों में बाँट देने का निर्णय दे देती है जिस पर धर्मराज कहाए जाने वाले युधिष्ठिर मोहर लगाते हैं क्योंकि कहीं न कहीं आसक्त हो उठे थे वो भी उसके रूप लावण्य पर . वहां कौन ऐसा था जो द्रौपदी की रूप राशि से प्रभावित न हुआ हो या उस पर आसक्त न हुआ हो . शायद यही कारण था युधिष्ठिर एक तर्कसंगत विद्रोह नहीं करते तो कैसे जानते हुए भी प्रतिकार कर सकते थे द्रौपदी के अभीष्ट का क्योंकि जो छुपा रहता है तभी तक सही है सामने आने पर उन सबके सत्य भी सामने आ जाते तो शायद कोई किसी को मुंह दिखाने के काबिल ही नहीं रहता . शायद यही मुख्य वजह रही हो सबके चुप रहने की और द्रौपदी और अर्जुन ने अपना अभीष्ट अपने तरीके से पाया हो . तभी कवि कहता है :
“तय हो गया कि दिन उनके हैं / रात चाहे बारी वाले किसी भी पति की हो / अन्याय के प्रतिकार का यही था एकमात्र रास्ता”  
संभव सब कुछ है क्योंकि अतीत में क्या हुआ कौन जानता है ? वैसे भी इतिहास में जो दर्ज होता है वो कभी पूरा सत्य नहीं होता .
कामना हो या वासना जब तक पूरी नहीं होतीं दग्ध करती ही रहती हैं . ऐसा ही मानो कवि कहना चाहता है ‘चुम्बन ही चुम्बन’ कविता द्वारा जब द्रौपदी स्वप्न में ही कामक्रीड़ारत हो जाती है अर्जुन संग . इस चित्र को खींचने में कवि ने बेशक कहीं त्याज्य शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो भौंडापन आता लेकिन जिस खुलेपन से चित्र को खींचा है वो कवि की निर्भीकता को दर्शाता है . आज के समय में रतिक्रिया पर लिखना एक बेहद साहसपूर्ण कार्य कहा जाता है और कवि ने उस साहस का निर्वाह कुछ ऐसे किया विपरीत रति के माध्यम से जो अक्सर कहने से हर कोई झिझकता है . वैसे ही इस सब्जेक्ट पर लिखना स्वीकार्य नहीं होता उस पर पुरुष द्वारा न होकर रतिक्रिया स्त्री द्वारा आकार पाए तो कहा ही जायेगा साहसिक कार्य . सम्पूर्ण कामुकता का दर्शन कराया है कवि ने . लेकिन क्या ये संभव नहीं ? प्रश्न उठता है . क्यों नहीं , आखिर द्रौपदी एक स्त्री थी , उसमे भी कोमल भावनाएं थीं तो कैसे संभव है वो उनसे अछूती रहती . फिर अन्य चार पतियों से कब संतुष्ट हो पायी होगी ? और जब स्त्री संतुष्ट नहीं होती तो खिन्नता आकार लेती है और मानो उसी से निजात पाने को जब वो ख्यालों में डूबती होगी अर्जुन के क्योंकि वो ही उसका पहला और आखिरी प्रेम था तो क्या संभव नहीं वो उन ख्यालों में या उन स्वप्नों में जो दिन में भी साकार हो उठते होंगे , उनमे रतिक्रीड़ा में रत हो जाती हो . संभव है ये भी . मानो कवि कहना चाहता है कामभावना सबमे समान होती है फिर वो स्त्री हो या पुरुष और जब वो संतुष्टि नहीं मिलती तो मानसिक रति भी आधार बन सकती है . वहीँ मानो कवि ये कहना चाहता हो कि कितनी उद्दात्त थी द्रौपदी की प्रेम भावना जो स्वप्न में भी सिर्फ अर्जुन का ही साहचर्य चाहती थी कहने को उसके अन्य चार पति और भी थे लेकिन रतिक्रिया में संतुष्टि अर्जुन से ही मिलती होगी . संग्रह का ये टुकड़ा ‘चुम्बन ही चुम्बन’ जाने कितनी खिड़कियाँ खोल देता है . एक तरफ तो द्रौपदी का प्रेम तो दूसरी तरफ उसकी कामासक्ति , कितनी गहन अंतर्वेदना से गुजरी होगी शायद कोई सोच भी नहीं सकता . स्त्री यौनिकता पर कब कोई सोचना चाहता है फिर कहना तो बहुत दूर की बात होती है और कवि ने न केवल सोचा बल्कि कहा भी . स्त्री वहीँ संतुष्टि पाती है जहाँ प्रेम आधार होता है मिलन का , जहाँ धैर्य होता है न कि सिर्फ स्खलन तक ही सम्भोग . जैसा कि उसके अन्य पतियों के साथ होता होगा . एक साहसपूर्ण विचार दिया है कवि ने सोचने को लेकिन इसके साथ ये भी कहना चाहूँगी यदि यही बात एक स्त्री ने कही होती तो अब तक साहित्य जगत में जाने कितना बड़ा हंगामा हो गया होता . यही अंतर है स्त्री और पुरुष में और उसके लेखन के प्रति यहाँ बैठे पुरोधाओं की सोच में . क्योंकि भुक्तभोगी हूँ इसलिए समझ सकती हूँ . स्त्री पुरुष मिलन की प्रथम बेला का कभी मैंने भी वर्णन किया था कविता में तो कहा गया ऐसा लिखना साहित्य में वर्जित है और आज जब एक पुरुष ने लिखा तो सब स्वीकार्य है जो यही दर्शा रहा है कितना बड़ा फर्क है आज भी दृष्टिकोण में . शायद वो ही बीज सदियों से चले आ रहे हैं महाभारतकाल से ही तभी स्त्री पुरुष का भेद कभी मिट ही नहीं सका . यहाँ अपना सन्दर्भ देने का यही उद्देश्य है कि आज चाहे कहने को कितने ही हम आधुनिक हो गए हों सोच से वो ही सामंती सोच के मालिक हैं . जब आज ये हाल है तो उस समय स्त्री की क्या दशा होगी सोची जा सकती है लेकिन साथ ही एक दूसरा पक्ष भी निकल कर आता है कि थीं कुछ स्त्रियाँ उस समय में भी काफी बोल्ड जो अपने निर्णयों को कार्यन्वित करना जानती थीं फिर वो कुंती हो या द्रौपदी .

कैसा विचित्र संयोग /पुरुरवा,नहुष,ययाति /जैसे महाप्रतापी परन्तु कामांध/नृपों की कहानी / बार बार दुहराता रहा इन्द्रप्रस्थ / जहाँ किया गया स्त्री मर्यादा का बार बार अपहरण / उसकी इच्छाओं /उसके अधिकारों/ उसकी स्वायतत्ता का / किया गया बार बार हनन /झेला देवियों , महारानियों और देवियों ने / हर बार वही संताप दुःख और अवमानना / छली स्वार्थी प्रपंची पुरुषों के हाथ
‘आवश्यक है इन्द्रप्रस्थ’ में कवि ने न केवल ऊपर लिखित व्याख्या दी बल्कि उस समय के राजाओं के चरित्रों को भी बखूबी उधेडा है मानो कवि कहना चाहता है जो भी हुआ कहीं न कहीं राजाओं के स्त्री पर किये गए छल और अत्याचार ही वो नींव बने जिन पर भविष्य की लडखडाती ईमारत बनी जिसे एक दिन ध्वस्त होना ही था और हुई . कामवासना मानो उस समय के राजाओं का मुख्य शगल था और स्त्री सिर्फ संपत्ति या वस्तु तो उसके उपयोग का उन्हें पूर्ण अधिकार था , जब ऐसी सोच राजा की होगी तो कैसे संभव है वहां धर्म और न्याय का होना . वही संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते गए और कुरुक्षेत्र का कारण बने . अपने स्वार्थ और अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते थे और यही तो हुआ द्रौपदी के साथ जब युधिष्ठिर ने उसे दांव पर लगा दिया अपनी संपत्ति समझ . लेकिन यहीं एक ख्याल यहाँ ये भी आता है मानो युधिष्ठिर को मौका मिला था द्रौपदी से बदला लेने का , जैसा कि कवि ने चित्रित किया है कि वो दिन में अर्जुन से मिला करती थी तो क्या ये एक सम्राट से छुपा रहा होगा , जानते सब थे लेकिन चुप थे और खामोशी से उस ज़हर को पी रहे थे और अब मौका था तो कैसे युधिष्ठिर जाने देता , आखिर था वो भी पुरुष , जो हो गया था द्रौपदी को देखते ही उस पर आसक्त , तो ये भी संभव है उसने इस तरह अपमानित कर बदला लिया हो , ये मेरा दृष्टिकोण है कवि का नहीं , लेकिन जो कवि की दृष्टि है ये उसी को आगे बढ़ा रहा है और शायद ऐसा हुआ भी हो क्योंकि यदि द्रौपदी ऐसा सोच सकती है तो युधिष्ठिर क्यों नहीं ?

परन्तु पाप था बाकि चारों के मन में अर्जुन असमंजस में /कौन सुनता द्रुपद के द्वारा उठाये नैतिकता , धर्म और न्याय के प्रश्नों को /और देता समुचित समाधान /पूछता कौन द्रुपद के स्वर में स्वर मिला / क्या लागू रहेगा यही नियम/ भविष्य में भाइयों द्वारा किए गए अन्य विवाहों पर ?
‘जब तक जीवन है’ के माध्यम से ऊपर लिखित प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं . साथ ही युधिष्ठिर को बेशक इतिहास में धर्म का प्रतीक दिखाया गया हो लेकिन थे बहुत कमजोर . कामवासना से ग्रस्त ऐसा राजा जो न चाहते हुए भी सब पाना भी चाहता था बस कहता नहीं था लेकिन हाथ आया अवसर गंवाना भी नहीं चाहता था तभी तो उनकी बुद्धि और विवेक सब धरे के धरे रह जाते थे वासना के अंधड़ में तो दूसरी तरफ प्रतिशोध के अंधड़ में लगा दी द्रौपदी भी दांव पर . 

‘माँ जानती थी’ के माध्यम से कवि ने न केवल अर्जुन के मन की पीड़ा को उकेरा है बल्कि अलिखित समझौते पर उसके द्वारा किया गया अमर्यादित हस्ताक्षर के माध्यम से कुंती पर भी आक्षेप किया है . मानो कवि अर्जुन के माध्यम से कहना चाहता हो , अर्जुन तुमने अभी अपनी माँ को जाना ही कहाँ है ? यद्यपि वो जानती थी स्वयंवर में गए हैं तो जीतेंगे ही तथापि ऐसा कहना कि आपस में बाँट लो , अर्जुन को सोचने पर बेशक विवश करे लेकिन कहीं भी किसी ने भी द्रौपदी को इंसान नहीं समझा . सिर्फ वस्तु या संपत्ति फिर वो कुंती हो या उसके पाँचों पति , इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी ?

‘लहरों में खड़ी’ कुंती के जीवन का मुख्य बिंदु है . शायद रख दी थी नींव समय ने यहीं से महाभारत की . एक तरफ कुंती को बोल्ड दिखाया गया है जो अपनी मर्ज़ी से सूर्य के साथ सहवास करती है और पूर्ण तृप्ति पाती है तभी कर्ण से पुत्र को जन्म दे पाती है और यही बोल्डनेस आगे भी देखने को मिलती है जब पांडू सहवास में असमर्थ होते हैं तो राज्य का लालच उसे फिर अन्य देवताओं के साथ सहवास करने को उकसाता है और वो अपना अभीष्ट प्राप्त करके ही रहती है . मानो कवि कहना चाहता हो ऐसी स्त्रियाँ जो अपने निर्णय स्वयं लेती हैं उनके लिए ये एक आम बात होती है कि जिस पुरुष पर आप आसक्त हो उससे जब चाहे सम्बन्ध बना सकते हो या फिर अपना कोई अभीष्ट सिद्ध होता हो तो सम्बन्ध बनाने में हर्ज नहीं समझतीं तभी तो अपने अभीष्ट को प्राप्त करने हेतु वो एक पल नहीं लगाती द्रौपदी को पांच पुरुषों में बांटने में . उसके लिए आम बात है क्योंकि जो प्राप्त करना है उसके लिए ऐसा करना ही होगा वहां भावनाओं और नैतिकता का कोई स्थान नहीं . मानो बस यहीं तक है कुंती की धारणा . मानो कवि कहना चाहता हो उसके लिए सती सावित्री वाली इमेज महज एक ढकोसला है . स्वतंत्रता और अधिकार ही मायने रखते हैं . जो आज तक स्त्रीत्व के गुण गाये गए हैं उन सबसे परे है कुंती फिर चाहे उसके लिए उसे कितनी ही धिक्कार सहनी पड़े , नैतिकता आदि शब्द बस शब्द ही हैं , उनसे उसका कोई सरोकार नहीं . जैसा कि आजकल हो रहा है शायद वही उस वक्त कुंती ने किया था जो उस वक्त स्वीकार्य नहीं था .

वहीँ एक ख्याल और मेरे जेहन में उठता है मानो कुंती ने ही द्रौपदी को वो राह दिखाई हो और कहा हो बाद में कि बेशक तुम्हारे अन्दर अर्जुन के लिए कोमल भावनाएं हैं इसलिए चाहो तो दिन तुम्हारा है सिर्फ रात भर की ही तो बात है . तुम दिन में अपना समय जिसके साथ जैसे चाहे गुजार सकती हो और तब आसान हो गयी हो द्रौपदी की राह क्योंकि कुंती जानती समझती तो सब थी ही और उसके लिए वैसे भी एक हो या चार कोई फर्क नहीं पड़ता था इसलिए ऐसी सलाह देना आसान था . क्योंकि जिस हिसाब से कुंती को इतना बोल्ड शुरू से दिखाया गया है और उसके निर्णयों का कोई यदि उल्लंघन नहीं कर सकता था तो कैसे संभव था अर्जुन और द्रौपदी का दिन में मिलना ? कहीं न कहीं कुंती की सहमती रही ही होगी और मूँद ली होंगी उसने आँखें इस तरफ से क्योंकि उसका लक्ष्य बहुत बड़ा था और स्त्री कामवासना की तृप्ति के लिए जरूरी था उसे भी तृप्त रखना . एक कुशल राजनीतिज्ञ की भांति मानो कुंती चाल पर चाल चल रही थी . एक पक्ष ये भी हो सकता है . 

‘कुल और गोत्र’ और ‘देखे मैंने उन आँखों से’ के माध्यम से कवि ने नया सिर्फ एक ही पहलू रचा है और बाकि सब तो सबका सुना पढ़ा जा चुका है कि कैसे कर्ण के मन में द्रौपदी के प्रति द्रुपद लालसा उत्पन्न करवाते हैं और बाद में कृष्ण के कहने पर अपमानित किया जाता है . 

अंत में ‘प्रत्येक स्त्री का इन्द्रप्रस्थ’ के माध्यम से द्रौपदी के ह्रदय की व्यथा को चित्रित किया गया है . वहां वही प्रश्न दस्तक दे रहे हैं जो अनंतकाल से हर बुद्धिजीवी उठा रहा है लेकिन पितृ सत्तात्मक समाज सब जानते बूझते भी उन्हें तवज्जो नहीं देना चाहता सिर्फ अपने एकाधिकार के लिए . लेकिन द्रौपदी जिसने इतना तिरस्कार , अपमान सहा मानो वो छोड़ जाना चाहती है अपने बीज इसी संसार में ताकि आने वाली पीढ़ी को उनसे दो चार न होना पड़े मानो कहना चाहती है , “उठो स्त्री, खुद मुख्तार बनो , मत धर्म/परंपरा के नाम पर व्यभिचार की शिकार बनो .” बस इतना ही कहना चाहता है कवि बेहद दुखी मन से .

सम्पूर्ण काव्य संग्रह स्त्री के स्त्री होने की सजा का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है . स्त्री होना अभिशाप नहीं लेकिन अतीत ने ऐसे बीज बोये आज तक वो ही फसलें कट रही हैं शायद यही वजह रही हो कवि मन के आहत होने की और फिर लिया हो संभावनाओं ने जन्म जब सोच का दरिया ठाठें मारने लगा हो . यूँ ही तो नहीं लिखी जाती कोई भी विरिदावली. कितना गहन चिंतन मनन किया गया होगा तब जाकर हर पात्र की मनः स्थिति को आत्मसात किया होगा . फिर वो कैसे कलम के माध्यम से कागज पर उतरा होगा ये भी विचारणीय बिंदु है . यदि आज के सन्दर्भ में देखें तो वही सब आज भी किसी न किसी रूप में हो ही रहा है . वैसे भी कहा जाता है परम्पराएं बड़े घरों या राजाओं के माध्यम से ही शुरू होती हैं और उनका निर्वाह प्रजाजन करते हैं . शायद यही है कारण जो आज तक उस कालिख को वक्त अपने माथे से पोंछ नहीं सका . ज्यों की त्यों बोई गयीं और फसलें आज भी चुभन का बायस बनी हुई हैं . बेशक कुछ बदलाव है लेकिन नगण्य या कहिये उतना ही जितना द्रौपदी या कुंती में था . कवि ने पाठक को चिंतन की एक नयी दिशा पकड़ाई है . सोच को नया नजरिया दिया है जिसके लिए कवि बधाई का पात्र है . निसंदेह ये नजरिया आने वाली पीढ़ी के चिंतन में एक नया अध्याय जरूर जोड़ेगा .
कवि का गीतों से कितना प्रेम है वो भी जगह जगह उभर कर आया है मानो इस बहाने कवि ने उन गीतों को फिर याद करने का पाठक को मौका दिया हो .

इस काव्य संग्रह को लिखने का शायद कवि का मुख्य उद्देश्य यही रहा है कि मर्यादाओं का जितना हनन उस काल में हुआ शायद आज भी नहीं होता होगा .उस जड़ सोच को आज का युवा उखाड़ फेंक रहा है जो जरूरी है वर्ना अनंतकाल तक जाने कितनी पीढियां और तबाह होती रहें . एक विश्लेषणपरक विचारणीय संग्रह हेतु कवि का आने वाला कल शुक्रगुजार रहेगा .

बुधवार, 6 जुलाई 2016

तुमने कहा

तुमने कहा
गर्दन झुकाओ और ढांप लो अपना वजूद
कि
अक्स दिखाई न दे किसी भी आईने में

मैंने हुक्मअदूली करना नहीं सीखा
वक्त रेगिस्तान की प्यास सा
बेझिझक मेरी रूह से गुजरता रहा
सदियाँ बीतीं और बीतती ही गयीं
और आदत में शुमार हो गया मेरी बिना कारण जिबह होना

नींद किसी शोर खुलती ही न थी
जाने कौन सी चरस चाटी थी ...

फिर तुमने कहा
जागो , उठो , बढ़ो , चलो
कि सृष्टि का उपयोगी अंग हो तुम

कि
तुम्हारे बिना अधूरा हूँ मैं
न केवल मैं
बल्कि सारी कायनात
कि
तुम्हारे होने से ही है मेरा अस्तित्व
मैं और तुम दो कहाँ
समता का नियम लागू होता है हम पर

और मैं जाग गयी
उठ गयी चिरनिद्रा से

फिर क्यों नहीं तुम्हें भाता मेरा जागरूक स्वरुप
फिर तुम पति हो , पिता , भाई या बेटे

सुलाया भी तुमने और जगाया भी तुमने
तो भला बताओ मेरा क्या दोष?

फिर भी
मैं निर्दोष जाने क्यों होती रही तुम्हारे दोषारोपण की शिकार
कशमकश में हूँ ...

मंगलवार, 21 जून 2016

राजपथ पर योगाभ्यास

समुद्र सूख रहा है
और तलहटी में बिलबिला रही हैं
सुनहरी , हरी , नीली मछलियाँ

कोई उद्यम नहीं करना अब
जिंदा रहने को जरूरी है पानी

और पानी
आज सूख चुका है
हर नदी तालाब और कुओं से
फिर क्या फर्क पड़ता है
इन्सान और इंसानियत के पानी पर
कोसने के लतीफे गढ़े जाएँ
फफोलों का पानी काफी है जीने के लिए

ये चुकने का समय है
इंसान कहलाने वाले दानव का
पानी कोसों दूर, न था न है
बस शर्मसारी को थोक में बेचा गया बाज़ार में

अब खाली लोटे लुढ़क रहे हैं
टन टन की आवाज़ के साथ
और टंकारों से अब नहीं होतीं क्रांतियाँ

ये आँख का पानी मरने का समय है
ये चुल्लू भर पानी में डूबने का समय नहीं

तो क्या हुआ
जो सूख रहा है समुद्र
तुम्हारी संवेदनाओं का
आशाओं का
विश्वास का

पानी समस्या नहीं
इंसानियत जिंदा थी, है और रहेगी
बिना पानी भी
फिनिक्स सी ...
ये समय है
दरकिनार करने का
छोटी मोटी बातों को

कि
स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का विकास संभव है
काया का निरोगी होना जरूरी है
बिना पानी भी

आओ राजपथ पर करें योगाभ्यास

शुक्रवार, 10 जून 2016

नया ज्ञानोदय में प्रकाशित

ज्ञानपीठ से निकलने वाली पत्रिका 'नया ज्ञानोदय ' के जून अंक में इस बार मेरी पांच कवितायें प्रकाशित हुई हैं जिनकी सूचना मुझे मित्रों और अजनबी पाठकों के फोन द्वारा प्राप्त हुई . 

7 जून से अब तक जाने कितने फ़ोन आ चुके हैं लेकिन अभी पत्रिका मुझे प्राप्त नहीं हुई इसलिए ‪#‎मुकेशदुबे‬ जी से फोटो प्राप्त किये और आज यहाँ लगा रही हूँ . ख़ुशी का पैमाना पाठकों की प्रतिक्रियाओं से लबरेज हुआ जा रहा है . 

जब 7 जून को पहला फ़ोन मिला तो यूँ लगा जैसे किस्मत ने जन्मदिन की पूर्व संध्या पर अपनी तरफ से एक उपहार दे दिया हो:)





शुक्रवार, 3 जून 2016

दुर्योधन व अन्य कवितायेँ ... मेरी नज़र से



मीना अरोरा का कविता संग्रह 'दुर्योधन व अन्य कवितायेँ ' एपीएन पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ है . बेहद सरस , सहज और सरल भाषावली में कवितायेँ पाठक मन तक पहुँचती हैं . उनकी कविताओं में कहीं व्यंग्य की तेज धार है तो कहीं सामाजिक चिंता तो कहीं राजनितिक परिवेश पर तीखा प्रहार .
पहली ही लम्बी कविता 'दुर्योधन' कवयित्री की सोच के दायरे को बताती है कि कैसे एक संवेदनशील ह्रदय जब किसी विषय पर गौर करता है और पुरा और आधुनिक काल का तुलनात्मक अध्ययन करता है तो दोनों परिवेश के आकलन से जो निष्कर्ष निकलता है वो न केवल सटीक और सार्थक होता है बल्कि मान्य भी क्योंकि काल कोई रहा हो दुर्योधन हो या रावण न मरे हैं न मरेंगे क्योंकि दोनों ही अहम् के प्रतीक हैं . आज अपने अहम् के आगे किसी रिश्ते की कोई परवाह ही नहीं रही तो क्या फर्क है उस काल में और आज के वक्त में ..........देखा जाए तो कोई फर्क नहीं और शायद यही कवयित्री के कहने का मकसद रहा . स्त्री कल भी अपमानित , प्रताड़ित होती रही आज भी , कल भी सत्ता के लिए अपनों का खून बहाया जाता रहा और आज भी . वहीँ इस कविता के माध्यम से एक और शिक्षा देने की कोशिश की है कि जब अंत काल आता है तब बड़े से बड़ा पापी दुराचारी भी अपने पापों या अपनी कमियों का आकलन करने लगता है तब जाकर वो जीवन का वास्तविक अर्थ समझ पाता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है . वहीँ मानो दूसरी तरफ ईश्वर को भी कवयित्री कटघरे में खड़ा कर देती है और कह देती है , सब करने वाले तो तुम हो , जिसे जैसे चाहे नचाते हो और दोष मानव पर मढ देते हो . एक तीर से जाने कितने शिकार किये हैं इस कविता में कवयित्री ने .
'घटना या दुर्घटना' राजनितिक चेहरों और आम जनता के मध्य की खाई को इंगित करती एक सरल भाषा में प्रस्तुत कविता है जिससे अनजान तो कोई नहीं लेकिन कह नहीं पाते और इस कविता में कवयित्री ने उन भावों को शब्द दे दिए . यही है कवयित्री के लेखन की खूबसूरती कि वो ऐसे भावों को शब्द दे देती हैं जिन्हें कई बार इंसान शब्दबद्ध नहीं कर पाता.
मानवाधिकार , झूठी कहानी , उम्मीदों का बक्सा ,समस्या , मेरी खता आदि ऐसी कवितायेँ हैं जहाँ सामाजिक विसंगतियों पर बिना किसी शोर शराबे के कवयित्री ने प्रहार किया है जो सोचने को विवश करता है .वहीँ 'चीख' कविता में धरती की चीख के माध्यम से सारे संसार में व्याप्त अव्यवस्था, आतंकवाद , वर्चस्ववाद को बखूबी उकेरा है .
कवयित्री की कवितायें आम जन की चिंताओं की कवितायेँ हैं . यहाँ न भावों का अतिरेक है न ही विषद व्याख्याएं . एक सहज गेयात्मक शैली में संसार और मानव ह्रदय में व्याप्त समस्याओं को शब्दबद्ध किया गया है . स्त्री विषयक समस्याएं हों या आतंकवाद या बलात्कार या फिर प्रेम सब पर कवयित्री की कलम चली है . कवयित्री की कविताओं में कोई आक्रोश नहीं , कैसे सहजता से बात कही जा सकती है वो इस संग्रह को पढ़कर जाना जा सकता है . कवयित्री का लेखन इसी तरह आगे बढ़ता रहे और पाठकों को उनकी खुराक मिलती रहे , यही कामना है .